बेटी
बंद आँखों में
मौसम के सम-विषम को साधती बेटी;
अंजलि-भर फूलों को
सुंदर, साकार स्वप्नों में घोलती बेटी;
प्रसन्न चित्त से
समीप-दूर की हरियाली-सुरभियों को पढ़ती बेटी;
खुले मन से
जीवन के ओर-छोर को बाँधती बेटी;
जीवन की भाषा-विधा को
सुशब्दित, सुशिल्पित, प्राणित करती बेटी!
संक्रांति की वर्तनी को
शुभ, उज्ज्वल सौन्दर्य देती बेटी!
समय का विधान कुछ भी हो,
जग-मानस पर नयी-नयी पहचान बनाती बेटी!
मौसम की बचपना हो या बचपना का मौसम,
सबों में मज्जित हो अठखेलियाँ करती बेटी !
-सतीश
Jan 14, 2023.
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