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जीवन से बड़े होते हैं क्या ?

बड़े से बड़े  अपमान या सम्मान स्वयं  जीवन से बड़े होते हैं क्या?  खुली आँखों के सामने बुद्धि के चकाचौंध उजियाले में  एक पूरा युग  चुपचाप बीत गया, रीत गया; समय गाढ़ी निर्ममता के साथ हम सबों को निठल्ला कर गया, बेतरतीब, नाचीज़ बनाता चला गया, हम असहाय, निरुपाय पड़े रहे!  ज़िद की अकड़ गहरी होती गयी, गाँठें खुलने से डरने लगीं, मान टूटते रहे, चित्र बिखरते रहे, छोटे होते गये हमारे मानचित्र! अपमान और सम्मान के तौल-तराज़ू पर चढ़कर हम मनुष्य बनने से हिचकते रहे!  अपने-अपने घरौंदे में,अपने-अपने दलानों पर,  चौरों में, चौराहों पर हम अपनी कुंठाओं का व्यूह बनाते रह गये, अपनी-अपनी स्वघाती प्रतिज्ञाओं के खूँटे में  आचार-विचार को, सत्य-सही को निरीह बाँधते चले गये।  फिर, मूलत:, जीवन जीवन ही नहीं रहा, भीतर-ही-भीतर धुरी हिल गयी, जीवन हमारा ही नहीं रहा, अंतत:, जीवन ही नहीं रहा!  हम जीवन को जीवन तो होने दें!  सम्मान या अपमान जीवन से बड़े हो सकते हैं क्या?  -सतीश  Feb 25, 2023. 

सत्ता-भवन

सोचता हूँ, सत्ता का सुंदर, सुसंस्कृत, माननीय  धर्म-कर्म-भवन कैसा होगा?  निर्माण की प्रेरणाओं से भरी, संस्कृति के अवयवों से आबद्ध  सत्ता-व्यवस्था की मेज़ों पर  तकनीकों के प्रेम-भाव में डूबा कम्प्यूटर हो,  और कुछ जनता के पास रोटी भी न हो!  बेचते रहें बड़े-छोटे दल अपनी टिकटें पैसों पर, संसद में, प्रजातंत्र के संस्थानों में श्रृगालों, व्याधों-वधिकों, चेतना के वधिरों की भीड़ हो!  स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्षों के बाद भी दिल्ली अनमनी, सोयी-सोयी-सी लगती है, वह आत्म-मुग्ध, खोयी-खोयी सी लगती है!  भारत-भूमि जनता को खोज रही है, जनता भारत की आत्मा टटोल रही है!  जनता युग-संघर्ष में लगी है, सत्ता के नायक समीकरणों में व्यस्त हैं!  सत्ताओं की नाकों के ठीक नीचे दिल्ली दूषित है, रोगग्रस्त है, संस्कृति की मानिनी यमुना  भयानक रूप से उपेक्षित, प्रदूषित है!  पढ़े-लिखे लोग, लेखक-पत्रकार-साहित्यकार, कवि-कलाकार, गीत-ग़ज़लकार, कहानियों के ऊँचे प्रणेता,  लेखों-आलेखों, विवरणों-बहसों का “शुभ लाभ” बटोरने में निमग्न हैं!  जनता का बड़ा हिस्सा अब भी लु...

हे मन, तू भोर बन!

हर भोर बार-बार कह जाती है - तू सहज मोद में रह, मद में नहीं; हर दिन वह जग कर बता जाती है- सूर्य का अनवरत उजलना, उजलते रहना  है एक कर्तव्य-धर्म, धर्म-सम्मत क्रिया, एक आवश्यक, अरोक प्रक्रिया,  धरती, प्रकृति के प्रति कृपा-दान नहीं!  यह भी सच है कि तम का विन्यास चाहे जितना भी सघन हो, सायास या अनायास आकर  वह चाहे जितना भी ठहरा-गहरा हो जाये, वह जीवन की उच्च संज्ञाएँ नहीं बनाता, चरित्र की कहावत नहीं बनता, संहिता नहीं रचता! तू विश्वास कर!  भोर की प्रज्ञा एक बार भोर के हो जाने में नहीं, हर दिन, हर क्षितिज पर, हर आकाश में  नये चिंतन, नये मनन् का अवधान कर, नये ज्ञान, आत्म-ज्ञान का संधान कर अपने आप को गढ़ने में है, गढ़ते रहने में है, कर्तव्य के नूतन धवल तूणीरों से  नये-नये क्षितिज को मँढ़ते रहने में है!  यही है भोर, यही है भोर की अवधारणा;  हे मन, तू भोर बन!  सतीश  May 13, 2023.