भीतर-ही-भीतर
हमारे भीतर
ग़लत को गले लगाने की लत क्यों रहती है?
हर फिसलन पर लुढ़क जाने की बेचैनी क्यों रहती है?
अब-तब, यहाँ-वहाँ ऐसी भी विवशता क्यों आ जाती है?
“ऐसा ही होता है”, “ऐसा करना पड़ता है” इत्यादि की भीड़ में
हमारे महान् समीकरण, ऊँचे बोध इतने असम-विषम,
ओछे क्यों हो जाते हैं?
आदर्श का चुनाव इतना कठिन क्यों हो जाता है?
घोर दूषण अचानक ग्राह्य कैसे हो जाता है?
मन के भीतरी स्तरों में
दिन को रात बनने की आपाधापी कैसे आ जाती है?
शिखरों को समय-असमय अबूझ “शून्यता” से
अनजाना प्रेम क्यों हो जाता है?
क्या यही हमारी चेतना की “गुरू-पूर्णिमा” है?
क्या यही सत्पथ को मिला नैसर्गिक “सावन” है?
मन पूछ ही लेता है- भीतर-ही-भीतर!
सीधे, सहज, स्पष्ट रूप से!
-सतीश (4th July, 2023)
श्रावण का पहला दिन, राजगीर, बिहार
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