सर्प-कला !
सर्प-कला!
हम बड़ी-बड़ी “शिक्षा” लेकर,
ऊँचे “सभ्य”, “सुसंस्कृत” होकर
विष, विष-निवेश, विष-विनिमय
में पूरी साधना से लीन-तल्लीन-विलीन हैं!
अपने-अपने “फ़न” में माहिर,
दंश-कला के निष्ठावान साधक,
पद, पैसा, और पहुँच के खेल के विशेषज्ञ,
समाज के उज्ज्वल मणि, मोती-मरकत
निरंतर सम्पूर्ण मन से सर्प बने हैं,
विभिन्न भंगिमाओं, मुद्राओं में मग्न
सतत् सर्प बनने में तुले हैं,
बेहिचक अड़े हैं!
-सतीश
August 21, 2023
नागपंचमी, सावन।
जन्मेजय वाला सर्प यज्ञ जरूरी है।
जवाब देंहटाएं