मन-मुक्त, भाव-सिक्त

आज सुबह-सुबह की प्यारी धूप

यों ही फिसल गई, तरल होकर फैल गई,

हवाओं में है आनंदित सरसराहट,

लताएँ सीधे-सहज मन से परस्पर उलझ कर 

अपने आप को भूल गईं!


फूलों की पंखुड़ियाँ अलसा कर 

एक-दूसरे पर लेटी हैं, 

विविध रंगों के मकरंद हैं उमंग में थिरकते, 

दूर-दूर तक सुवास सहज ही भेज देते,

परिचित-अपरिचित भावनाओं के संग! 


हाँ, स्मृतियों में बैठी रही तुम निश्चिंत भाव से -

कभी सिमटती, स्वयं को सहेजती,

कभी खुल कर अनायास बह जाती आसक्त रक्त में, 

मन-मुक्त, भाव-सिक्त ! 


-सतीश 

Sep 18, 2023 


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