खिड़की
खिड़की
सुबह-सुबह,
खिड़की से होकर आसमान का छोटा टुकड़ा दिखा,
जीवन के रण को आसों की किरणें मिलीं,
धूप की भोली, मार्मिक उष्णता में
स्वप्नों को उन्मत्त उड़ानों की यादें आयीं!
पूरे आसमान को मापने-भाँपने के लिए
मोह छोड़ कर घर से बाहर निकलना पड़ा -
जीवन की अनिश्चितताओं को टोहते हुए,
जीवन की नियति को पढ़ते हुए,
नियति के जीवन को ढूँढते हुए!
घर की खिड़कियाँ स्मृति में गहरी जड़ी रहीं!
-सतीश
Feb 9, 2023
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