नदी और पत्थर
नदी और पत्थर
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पत्थरों, चट्टानों के तन से
टकरा-टकरा, फिसल-फिसल कर
नदी हो जाती है कलकल-छलछल,
उच्छल, निश्छल, आत्म-विह्वल;
अरोक उमंगों पर चढ़कर
सदेह विकल, सतेज, सप्राण,
तीक्ष्ण, कुछ और तरल हो जाती है;
सबकुछ भूल-बिसर कर
मन की धारा बह जाती है!
- सतीश
April 1, 2023.
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