दूरियाँ
प्रतीक्षा में भौंहें काली होती गईं,
पुतलियाँ यादों की मोड़ों, मरोड़ों पर
सीधी-टेढ़ी हो गयीं!
ओठ खुले, तो, खुले रह गये,
दांतों की चमक अनमनी तीखी हो गई,
आह से भर गालों की तरलता स्याह बन गई,
जीवन-ह्रदय की बूँदें चुपचाप टपक गईं!
दूरियाँ ठहरना भूल सी गईं!
-सतीश
Oct 3,2023.
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