यों हम सभ्य हुए
यों हम सभ्य हुए
जब हम सभ्य हुए
माता-पिता हाशिये पर आ गये,
बच्चों के लिए हम “पसरते” गये!
जब हम सभ्य हुए
पेड़-पौधे कटते गये,
नदी सिमटती गई,
शहर फैलता गया!
जब हम सभ्य हुए
महत्वकांक्षाएँ बड़ी होती गईं,
उनके मान-महत्व बौने होते गये!
जब हम सभ्य हुए
सफलता-असफलता के मूल उद्देश्य छिपते गये,
सोपान, मील-मंजिल, पड़ाव अनगिनत हो गये!
जब हम सभ्य हुए
धर्म की चेतना छोटी होती गई,
धर्म का व्यापार बढ़ता गया!
जब हम सभ्य हुए
राजनीति अपराध, विपदा होती गई,
संसद रोर-शोर से भरी ठगी का चौपाल हो गया! -
“लोकतंत्र”, “संविधान”, “विकास” और “धर्म” की
बेचैन लड़ाई लड़ते-लड़ते!
जब हम सभ्य हुए
पत्रकारिता राजनीति का पीड़ित कंदुक हो गई!
आत्मा के व्याकुल आलोड़न के साथ
वह कभी किसी के विरोध का बेशर्म औजार,
कभी अचानक, अनायास
प्रशंसा की रंगीन पिचकारी बन गई!
जब हम सभ्य हुए
जीवन कहीं फिसल सा गया,
कविता-कहानी-ग़ज़ल-गीत बड़े होते गये!
-सतीश
30 जून, 2024
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