हत्या और हत्यारे
हत्या और हत्यारे
- -
ख़ेमों-खाँचों में पड़कर,
या चौखटों में अटक कर,
अगर-मगर की पकड़ में जड़ होकर
जब-जब हम हिंसा की प्रत्यक्ष निंदा नहीं करते,
हम हिंसा करते हैं!
जब-जब नेता-प्रणेता, लेखक-पत्रकार-साहित्यकार
अपनी कुंठाओं को सुलगा-सुलगा कर
आयोजित, प्रायोजित-अप्रायोजित कुतर्कों को गढ़ते हैं,
विवरणों-बहसों, तथ्यों, तत्वों को असत्य से मढ़ते हैं
वे हिंसा-प्रतिहिंसा करते हैं!
संसद हो या सड़क,
गोष्ठी हो या न्यायालय,
वाम हो या दक्षिण,
या विचारों का कोई अन्य घोषित-अघोषित कुनबा,
जब-जब विचारधाराओं की अतिशयताएँ
आत्मा और विवेक की गूँजों को नहीं सुनतीं,
वे कहीं-न-कहीं, कोई-न-कोई हिंसा करती हैं!
जब-जब निष्ठाएँ सत्कर्म से बड़ी हो जाती हैं,
जब-जब खूँटों की प्रतिज्ञाएँ हमें आदर्शों के
उज्ज्वल स्वरों से दूर हाँकने लगती हैं,
हम हिंसा-प्रतिहिंसा करते हैं, करते रहते हैं!
जब-जब हम शांति के कबूतरों को
गिद्धों का पंजा पहनाते हैं,
हम हिंसा करते हैं, कर रहे होते हैं!
यों, चतुर्दिक हत्यारे हैं हेर रहे
प्रजातंत्र की आत्मा को
सीधी-टेढ़ी नज़रों से!
⁃ सतीश
जुलाई 14, 2014.
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें