व्यवस्था का अट्टहास

 व्यवस्था का अट्टहास 


कभी मैं मरता हूँ,

कभी तुम मरते हो,

कभी वे मरते हैं! 

पर, व्यवस्था 

हमेशा जीती है,

वही की वही बनी रहती है,

वो हमेशा निमग्न रहती है, 

राक्षसी अट्टहास में ! 


देश में किसी के मरने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता! 

सारे दल, दलदल चिल्ला-चिल्ला कर यही कहते हैं! 


सतीश 

28 जुलाई, 2024. 







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