कविता का बनना, नहीं बनना (भाग-2)
कविता का बनना, नहीं बनना
(भाग-2)
जीवन को ढूँढने में
तथाकथित रूप से भटक जाना,
भटकते-भटकते नया मानचित्र गढ़ लेना,
गढ़ने के प्रयास में एक यात्रा कर लेना,
यात्रा के ठौर, तरीक़ों से गुजर जाना कविता है!
अनुभूतियों से तप्त-शीतल होना,
उन्हें उघाड़-उघाड़ कर उनसे भीग जाना कविता है;
बहुतेरे भाव-धागों का कहीं छूट जाना,
फिर, स्मृतियों में सहज लेटे रहना कविता है!
भावनाओं की भंगिमाओं को पढ़ना,
पढ़ने की कोशिशों में
कभी डूब जाना, कभी उतरा जाना कविता है;
विचारों, तर्कों को छीलना,
कभी उनसे छिल जाना कविता है!
कभी आवश्यक, कभी अनावश्यक रूप से
राजनीति से टकराना,
टकरा-टकरा कर साहित्य की ओर मुड़ना,
ये कुछ पलायन, कुछ अवगाहन जीवन की कविता है!
⁃ सतीश
सितम्बर 1, 2024.
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