श्रीराम
श्रीराम
तेरे भाल के भव्य पटल पर
दिव्य जीवन-संघर्ष सहर्ष दमकता है,
तेरे नयनों की दृष्टि में सकल
संस्कृति की संकल्प-शक्ति विहँसती है!
तेरी पुतली के कंपन पर
मान-मर्यादा-छवि स्पंदित होती है,
तेरे कपोल पर
प्रकृति की रंग-तरंग मचलती है!
तेरे तीर-धनुष की आकृति में
जीवन-परिधि घूमती रहती है!
सरयू के पावन तट पर
तेरी जीवन-लीला न्यारी बसती है,
उसके सप्राण जल में
सृष्टि सचेतन समाधि लेती है!
⁃ सतीश
सरयू नदी, अयोध्या
21 मई, 2024.
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