दिल्ली

दिल्ली 


धर्म के तेज-तर्रार, सजीले, फुर्तीले, 

समय-समय पर नुकीले नारों के निर्घोषों,

रेतीले वादों, छवीले दावों के बीच

सात्विक यमुना प्रदूषित होती गई! 


राजनीति के दाँव-पेंच, उसकी ओट-चोट,

फिसलन भरे समीकरणों के बीच 

हवा ही शुद्ध नहीं रही! 

साँसें अपने आप से डरने लगीं,

उनका पूरा व्यक्तित्व ज़हरीला होता गया! 


यही दिल्ली है, यही दिल्ली का जीवन,

यही जीवन की दिल्ली! 


-सतीश 

गुरुग्राम, 27  जून, 2024







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