भुट्टे वाली की हँसी
भुट्टे वाली की हँसी
शाम का समय था,
मझौले क़द के हरे-भरे पर्वत के पीछे
सूरज छिप जाने पर तुला था;
पिछले जून,
झारखंड में देवघर से राँची जाने की राह में
कई लेनों वाली तेज-तर्रार सड़क पर
“गोला” के एक व्यस्त टॉल-बुथ के थोड़ा पहले
हाशिये पर, पथ के हाशिये पर एक महिला
(साँवला रंग, फुर्तीली आँखें, तीखी नाक,सुघड़ चेहरे को लिए)
अपनी आशाओं की मही को थामे
भुट्टा बना रही थी,
बेच रही थी,
एक भोली, स्पष्ट, निर्मल, निमग्न हँसी के साथ !
साथ में थी पढ़ाई के समय के बाद
स्कूल से लौटी बेटी,
एक छोटा सा बेटा भी था-
जो स्कूल जाने की अवस्था में नहीं था,
पर, जीवन को सीधे पढ़ने में तल्लीन था;
दोनों अपनी माँ को मदद् कर रहे थे उछल-कूद कर,
एक-दूसरे के उत्साह को उल्लास देकर -
कुंठा की गाँठ से मुक्त,
निर्विकार, उद्वेग-रहित!
सामने भुट्टे स्निग्ध आग में पक रहे थे।
वो महिला धर्म को कोस नहीं रही थी,
व्यवस्था की ओर उँगली नहीं उठाये थी,
पूँजी के तरीक़ों को,
पूँजीपतियों के आचार-विचारों को आह नहीं दे रही थी;
वह हँस रही थी, खुल कर, खिल कर,
मन भर, तन भर!
जीवन के तथाकथित बड़े-छोटे
अर्थों-अनर्थों-व्यर्थों में अटकी नहीं थी;
वह भुट्टा बना रही थी,
बेच रही थी!
चौड़ी, बेचैन सड़क उसकी खेत के बग़ल से
विकल होकर गुजर रही थी।
⁃ सतीश
अक्टूबर 6, 2024.
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