यह भली-निखरी धूप!
यह भली-निखरी धूप!
कार्तिक पूर्णिमा के एक दिन बाद की यह धूप,
न्यारी सी, प्यारी सी!
आसमान के नीले-नीले विस्तार को
शालीनता, शुभ्रता देती !
प्रेम-बल से खिली हुई,
फुदकती, फहरती, मन से फैलती,
नरम-नरम, पतली-पतली धूप
भरी दोपहरी में भी
तीक्ष्ण होने से हिचकती है!
उसकी किरणों की छुअन से हल्की-हल्की ठंडी हवा
अपनी तबियत बदल लेती,
चंचल होकर भी कुछ मर्म-उष्ण हो जाती,
कभी-कभी सरसरा जाती,
पूरे शरीर को आवाज़ से भर देती! -
नये-नये वेग से स्फूर्ति लेकर,
शालीन संवेग से इठला कर,
नित्य आवेग से मचल कर !
स्नेह से ऊँचे उठकर सीधी-सरल धूप
रूखे-सूखे पर्वत के अनमने,
नुकीले सिरे को सहर्ष उजाला सौंपती!
उधर,
मन के धागों को उलट-पुलट देती;
उन्हें याम, पहर, काल से परे
अनंत आयामों में पसार देती,
कभी बिखेर देती, कभी समेट लेती! -
ये भली-निखरी, भोली धूप!
⁃ सतीश
नबम्बर 16, 2024
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें