मैं दिन हूँ, मैं रात हूँ


मैं दिन हूँ, मैं रात हूँ 


मैं दिन हूँ, मैं रात हूँ,

जीवन की सीधी बात हूँ!

प्रकृति की सहज प्रवृत्ति,

मन की सच्ची सौग़ात हूँ! 


कभी तम-पूरित, कभी प्रकाशित, 

कभी सुडौल, कभी बेडौल, 

कभी स्थिर, कभी चंचल,

कभी पीड़ित, कभी उत्साहित,

कभी बहिष्कृत, कभी स्वीकृत,

कभी तिरस्कृत, कभी पुरस्कृत,

कभी विसर्जित, कभी सृजित,

कभी मज्जित, कभी प्लावित,

कभी खंडित, कभी मंडित, 

कभी धीर, कभी विचलित, 

जीवन का सहज गात हूँ। 


मैं दिन हूँ, मैं रात हूँ,

जीवन की सीधी बात हूँ! 


सतीश 

नबम्बर 16, 2024. 


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