विवशताओं के शृंगार-रस

  विवशताओं के शृंगार-रस


व्यक्ति हो या व्यवस्था,

या यंत्र-तंत्र, प्रशासन या देश, 

विवशताओं के शृंगार-रस बड़े घने हुआ करते हैं! 

वे विविध भंगिमाओं के साथ अपनी

छवि के असंख्य वाण फेंकते रहते हैं;

उनके प्रमाद हमें जगने नहीं देते, चेतन होने नहीं देते,

सही सोचने नहीं देते, रीढ़ को सीधा होने नहीं देते, 

पंख को फड़फड़ाने नहीं देते, हमें उड़ने नहीं देते। 


विवशताएँ पूरी अकड़ के साथ

बार-बार दुहराती हैं -

“सरकार की कुछ सीमाएँ होती हैं”,

“जो ऊपर है, उसको बहुत कुछ ध्यान में रखना पड़ता है”,

“अरे, एक व्यक्ति से कितनी अपेक्षा रखनी चाहिए”,

“सरकार चलाना आसान नहीं है”,

“मान लो, - - “


ये पुरातन विचार 

पूरे आचार-प्रचार से विविध आकार-निराकार रूपों में 

अमंद लय में आते-जाते रहते हैं - 

युगों से, युगों तक! 


दूसरे संदर्भों में, 

समय के देवता बड़ी आसानी से 

बता सकते हैं कि 

घोटालों से सने हुए व्यक्तित्वों के 

पक्ष में बड़े चिंतक, श्रेष्ठ धनुर्धर,

फैली हुई आत्मा वाले साहित्यकार,

पुनीत समाजी, प्रवीण वादी कहते आये हैं -

“अरे, ये ग़रीबों का मसीहा है”,

“यदि इसे कुछ हुआ तो ग़रीबों की राजनीति 

सौ वर्ष पीछे हो जायेगी”,

और, अंत में घोटाले के विरोधियों के लिए यह भी कि

“तुम तो ब्राह्मणवादी सोच के शिकार हो”! 

आदि, इत्यादि -  अनादि ! 


सोच की विवशताएँ 

प्रजातंत्र के लिए असामान्य नहीं! 

सचमुच, विवशताओं के शृंगार-रस  बड़े घने हुआ करते हैं,

इसके रस-भाव मोहक, आनंदमय, प्रबुद्ध भी होते हैं,

युग में, युगों से, युगों तक! 


सतीश 

10 June, 2022. (11.36 PM) 









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