जनता की मौत एक प्रक्रिया है!
जनता की मौत एक प्रक्रिया है!
आम लोगों की दुर्भाग्यपूर्ण मौत
दुर्घटना नहीं, एक-दो बार की घटना भी नहीं,
एक शाश्वत प्रक्रिया है प्रजातंत्र में;
वह घटित नहीं होती,
समय-समय पर सदेह अवतरित होती रहती है,
वह घटती नहीं, बढ़ती ही रहती है!
वो क्रिया-प्रक्रिया राजनीति के हरेक “घट” को,
घटक को, घाट को बेहिचक छूती गुजरती है!
इस बीच नेताओं के चिंतित वक्तव्य,
पत्रकारों की व्यग्र आपाधापी, लुकाछिपी,
विचारकों के मारक (कृपया मरणशील नहीं पढ़ें इसे)
तर्क-वितर्क-कुतर्क, विगलित विश्लेषण,
जनता की “मुक्ति-यात्रा” की अर्थी के
पवित्र अवयव बन जाते हैं,
बहुतेरे अर्थों से भरे, बहुआयामी सार्थकताओं से भरे!
हमारा आवश्यक कर्तव्य है कि
जनता की जनतांत्रिक हत्या में
अपनी-अपनी प्रतिज्ञाओं से बँधकर,
अपने-अपने खूँटों से अटूट लिपट कर
हम समाधिस्थ रहें,
सत्ता की परियों के अडोल सम्मोहन में
लिप्त-गुप्त-सुप्त रहें, मस्त-अलमस्त-व्यस्त रहें!
विशुद्ध, सात्विक, धर्मयुक्त, धर्म से निरपेक्ष
सच्चाई है कि
यह देश-भाव का दोहन नहीं,
धर्म-कर्म का अवमूल्यन नहीं,
व्यवस्था का नीच पतन नहीं,
बल्कि, प्रजातंत्र का पुनीत आरोहण है,
भव्य, भावमय, लय-तय अवगाहन है!
यही गीता है, यही क़ुरान है,
यही बाइबिल है, यही त्रिपिटक निकाय है,
यही जातक-कथा है,
यही प्रजातंत्र की अंतहीन प्रथा-कथा है!
जय भारत, जय जनतंत्र,
जय तंत्रों के अजेय मंत्र,
जय, जय, जय, जय!
⁃ सतीश
जून 4, 2025.
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