यों, लालिमा लाल हो गई!
यों, लालिमा लाल हो गई!
यों लालिमा लाल हो गई
उस आँचल सी,
कहीं चढ़कर, कहीं फिसल कर,
कभी चढ़कर, कभी फिसल कर,
भावों के अंगो की अंतरंग उमंगों में रंग कर!
सुंदरता से फैले हुए ललाट सी,
चहकती भृकुटी की आश्वस्त ज्या सी,
आत्म-पुलक की धार लिए पुतलियों सी,
ललक से भरी आँखों सी,
प्रसन्न सोच से भरे-उठे कपोल सी,
ग्रीवा के सजीले मर्म-घुमाव सी,
शील की सलोनी ऐंठन सी,
मन की छवि में लय स्थितप्रज्ञ झुमके सी,
अनकही कहानी को पढ़ने, छूने में अटके ओठों सी,
ह्रदय-पटल के भव्य विस्तार सी,
आग और राग के दो पवित्र केन्द्रों सी,
संवेदना और वेदना की पूँजीभूत अभिव्यक्ति सी,
सभ्यता और संस्कृति के दो अक्षों सी,
मान और सम्मान के दो उन्नत टीलों सी,
उचित और अनुचित के दो सहज द्वंद्वों सी,
पुरातन काल से असंख्य रंगों में जलती
दो सनातन वर्तिकाओं सी,
देह और अदेह, वासना और प्रेम, आकार और निराकार,
लोक और अलोक, सगुण और निर्गुण,
निगम और आगम, स्पृश्य और अस्पृश्य,
दृश्य और अदृश्य, पूर्णता और अपूर्णता,
कविता और अकविता, कहानी और अकहानी के
तन और मन के दो अपरिमित शून्यों सी,
उनकी अविभाज्य एकता सी,
सृष्टि की सम्पन्न व्याप्तियों सी,
कल्पना को साधे स्वप्न की प्राप्तियों सी,
स्वत्व से बँधी, स्वयं में भूली, स्व-चेतना से आनंदित
उभर कर छा जाने को आतुर दो उज्ज्वल गुंफित पहेलियों सी
एक गहरी अनुभूति, जो
कभी स्थिर रहती, कभी स्पंदित-कंपित हो जाती,
कभी शमित, कभी ज्वलित होती,
कभी रूकती, कभी बह जाती,
कभी शीतल, कभी उष्ण हो जाती,
कभी जमती, कभी पिघल जाती,
कभी चुप रहती, कभी कुछ बोल जाती,
जीवन-भित्तियों पर पसर गई,
स्मृतियों की टेक पर टिक गई,
झूलती, झूमती,
धीर-अधीर भावनाओं से गूँजती,
कहीं सशब्द, कहीं अशब्द होकर,
कभी सशब्द, कभी अशब्द होकर!
यों लालिमा लाल हो गई,
उस आँचल सी,
कहीं चढ़कर, कहीं फिसल कर,
कभी चढ़कर, कभी फिसल कर,
भावों के अंगो की अंतरंग उमंगों में रंग कर!
⁃ सतीश
मार्च 29/ मार्च 31, अप्रैल 2, 2025
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