तुम, माँ!
तुम, माँ!
तुम तन हो, तन के पार हो,
मन हो, मन के पार हो,
तुम सुंदरतम कल्पना हो, कल्पना के पार हो!
तुम घूर्णियों सी बेचैन
स्मृतियों के स्पर्शों की असंख्य परिधियाँ हो,
उन परिधियों के पार हो!
तुम चेतना हो, चेतनाओं के पार हो,
तुम युग-युगों की पुनीत धारणा-अवधारणा हो,
उन धारणाओं, अवधारणाओं के पार हो,
तुम प्रेम की श्रेष्ठतम छवि हो, समस्त छवियों के पार हो,
तुम सृजन का चिर नाद हो, सब नाद-निनादों के पार हो,
जीवन का परम सौंदर्य हो, सभी सौंदर्यों के पार हो,
तुम चरम जीवन हो, जीवन के पार हो,
पवित्रतम प्रार्थना हो, प्रार्थना के पार हो!
माँ!
⁃ सतीश
मई 29/ 31, 2025
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें