शून्य-अशून्य क्या है?
शून्य-अशून्य क्या है?
हाँ, शून्य-अशू्न्य क्या है?
चेतन, अवचेतन और अचेतन प्रवृत्तियों का
ऊभ-चुभ करते रहना,
उनका उठना-गिरना, उनकी उथल-पुथल -
ये शून्य के अवयव हैं?
सब शून्य में समाहित, शून्य से संधिबद्ध हैं?
शून्य का जो सप्राण भाव है,
वही जीवन-सार है, प्रसार है, संसार है?
शून्य का व्यक्तित्व कैसा है?
कुंठाएँ, हमारी उन्मादी उड़ानें,
जग के सौंदर्य-असौंदर्य, प्रश्न-प्रतिप्रश्न,
रोर-शोर, सारे रव,
रवविहीनता का विस्तार,
जीवन का प्रक्षेपण,
उसकी परिधि, उसकी आकृति,
फिर , उसका आकारहीनता की ओर बढ़ जाना,
आकर्षण-विकर्षण की शाश्वत घूर्णियाँ,
सृजन के छंद, विसर्जन के बंध,
योग का आरोहण, भोग का अवगाहन,
जीवन की संत-दृष्टि, वसंत-अनुभूति !
सब शून्य हैं,
शून्य के सक्रिय, सजीव, सहज हिस्से हैं? !
सतीश
मार्च 22/ मार्च 26, 2025
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