बड़ी सभा है!

बड़ी सभा है! 


बड़ी सभा है, बहुतेरे लोग हैं,

सदस्य हैं, दर्शक हैं, 

कोई भ्रम नहीं, कोई भ्रांत नहीं, 

सब श्रेष्ठ, सब संभ्रांत हैं, 

विद्वान हैं, पुरस्कृत हैं, 

जमी हुई कुर्सियाँ, उठी हुई मेज़ें हैं,

ऊँचे पायदान हैं, ज्वलंत स्तम्भ हैं, 

सबों की योग्यता पर प्रजातंत्र की मुहर है;

सभी तकनीकों से लैस हैं, 

आधुनिक तंत्रों, ऊँचे मंत्रों के बीच 

दावे हैं, वादे हैं, गर्जनाएँ है, आँसू हैं, 

बहसें हैं, ब्योरे हैं, अमोघ विश्लेषण हैं, 

तर्क-वितर्क हैं, आँकड़े, अंकगणित हैं, 

कविता-कला है, कहानी है, 

सब अपनों से, अपनत्व से लबालब हैं, 

चारों ओर लाभ-हानि है! 


हर संदेश में बार-बार साकार-निराकार देश है, 

पर, देश में जनता बेचारी अलग है, अकेली है,

अन्य है, अन्यमनस्क है; न जाने कहाँ भूली है? 


-सतीश 

मार्च 11/ मार्च 12 , 2025 


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