संदेश

मेरे भारत

सृष्टि-सृजन का प्रथम नाद,  मानवता की आदि कथा,  सभ्यता-संस्कृति का सुंदरतम बहाव,  धर्म की श्रेष्ठतम ध्वजा, महान्; सत्धर्म-निरत, सत्कर्म-रत, भारती-सुर, वेद-स्वर, मेरे भारत, तुम दीप्त भास्वर, सतेज, सहृदय, शालीन शीर्ष! क्यारी-क्यारी,फाँकों-खाँचों, ख़ेमे-खंडों को पाट-पाट कर,  अपयश-अपमानों को पी-पी कर मेरे भारत, तुमने सदैव उन्नत  मानवता को मन-मान दिया!  जीवन में सीधे पैठ-पैठ कर, वेद-उपनिषदों का अनुसंधान कर, योग-धर्म का संधान कर, निगम-आगम, निवृत्ति-प्रवृत्ति  को साथ समेट, बाँध-बाँध कर,  मेरे भारत, तुमने जीवनमय, अमोल अध्यात्म का गहरे अवगाहन किया!  विविध रीति-रिवाज-रस्मों,  धर्म-मर्म, बोली-भाषा-संवादों,  कृति-प्रकृति, ऋतु-मनुहारों को भूगोल-इतिहास में समेट-सहेज कर, मेरे भारत, तुमने पूरे जग को सनातन सार-तत्व, प्राण-प्रसार दिया!          -सतीश            30 Jan, 2021.

ऐसा हमारा गणतंत्र बने

हमारी व्यवस्था के सब अंग-प्रत्यंग सुचालित-जनसेवी-स्वतंत्र रहें, प्रजातंत्र के यंत्र-तंत्र पर   जन-गण की जय हो, प्रजातंत्र के मूल-मंत्र में देश-हेतु ही चरम ध्येय हो, विद्या-कला-गुण-धन, सब शक्तियाँ देश-मन पर अर्पित हों, ऐसा हमारा गणतंत्र बने। हर शिक्षा से बड़ी देश-शिक्षा हो, हर पूजा से बड़ी देश-पूजा हो, हर कर्म से बड़ा देश-कर्म हो, हर धर्म से बड़ा देश-धर्म हो, हर यज्ञ से बड़ा देश-यज्ञ हो, ऐसा हमारा गणतंत्र बने। तर्क-वितर्क हो, नोंक-झोंक हो, राजनीति के दाँव-पेंच हों, पर, दल-समूह प्रजातंत्र की दलदल न हो, संसद-सभा-संस्थानों की गरिमा बनी रहे, ऐसा हमारा गणतंत्र बने। सत्याग्रहों में सत्य का ईमानदार आग्रह हो, हड़तालों में समस्याओं की सजग पड़ताल हो, प्रदर्शनों में समाधान ढूँढने की सच्ची निष्ठा हो, हमारे अधिकार व कर्तव्य-बोध साथ-साथ बसें, ऐसा हमारा गणतंत्र बने। चाहे पक्ष हो या हो विपक्ष,  विरोध केवल विरोध के लिए न हो; बेहतर से बेहतर होने की  सकारात्मक प्रतिस्पर्धा हो, जन-जन की इकट्ठी प्रगति ही उद्देश्य रहे, ऐसा हमारा गणतंत्र बने।              ...

हर चोट की ओट में

हर   चोट   की   ओट   में   एक   देवी   बैठी   होती   है , सृष्टि   की   शक्तियों   को   सँभालती - सहेजती ; हर   घाव   की   पीड़ा   में सृजन   की   बेचैनी   बोलती   है , हर   दर्द   की   ऐंठन   में कृति - क्रिया   की   सुन्दर   भंगिमाएँ   बसी   होती   हैं। हर   अशुभ   में शुभ ,  शुभ्र   संभावनाएँ   समायी   होती   हैं , हर   ठेस - ठोकर   में ऊँची   छलाँगों   की   ऊर्जा   भरी   होती   है , हर   प्रहार   में प्रेरणाओं   के   चिन्ह   पड़े   होते   हैं , हर   विघ्न   में सुगति - संवेग   के   स्वप्न - संगीत   समाये   होते   हैं , समय   के   कठिन - कठोर   तेवरों   में प्रकृति   के   अदृश्य ,  अमोघ   आशीष   बसे   होते   हैं , हर   तम   म...

मकर-संक्रांति

                मकर - संक्रांति   के   पावन   पर्व   पर सूरज   की   किरणों   को   सीधे - सीधे   मन   में   उतरने   दो , कुहरा - कुहासा - कलुष   छँटने   दो , गहरी ,  बँधी ,  जड़   गाँठों   को ,  धीरे - धीरे   ही   सही ,  खुलने - उघड़ने   दो!  कल   तक   जो   सर्द   था , अब   उसे   नई   पावन   ऊष्मा   से , थोड़ा - थोड़ा   ही   सही , पिघलने - मिटने   दो! तब  जाकर   जीवन   का   एक सार्थक   वसंत   आयेगा  - नये   रंग - उमंग ,  नये   सौंदर्य   के   साथ ,  नई   छवि ,  नई   भाव - भाषा   के   साथ , सुंदर   नियत ,  सुंदर  भव- नियति   के   साथ!  फिर ,  प्रसन्नचित्त   होकर माँ   सरस्वती   वसंत-पंचमी को साथ लिए  जग - जीवन   में विद्या - क...

Big Technology !

                   “They” will define “Diversity”,     They will choose algorithms       To log    Ethics and Civility,       To label Religion and “Ism”,        To prescribe ‘Commune’,       ‘Capital’ and ‘Civilization’,       To create the make and model         Of truth, of goodness, of badness,       Of love and hate,          With their own bits-bytes-bites,          With their own ‘Graphic Design’,          With their own web,          With Liberty, For Liberty!          Technology, Embedded Technology!                                           ...

सत्ता का आग्रह

                               अक्सर ,  हमारी   व्यवस्था   में , सत्ता   के   घोषित   उजले - धवल   घरों   में स्वार्थ - अहम् - प्रपंच   के   ग्रह - तारे   बसे   हैं , पद - पैसे - पहुँच   के अनियंत्रित   तृष्णा - तेवर स्वत्व - साधना   के   पैने   अस्त्र - शस्त्र   बने   हैं; मर्यादा   के   भंजन - मंत्र शक्ति - संचय   के   मेरुदंड   बनकर   तने   हैं , संकुचित   स्व   की   संज्ञाएँ   उपलब्धियों   के बेडौल   आयाम ,  आकृति ,  आयतन   गढ़ती   हैं !  सत्ता   का   ऐसा   अतिशय   आग्रह , वस्तुतः   है   भयकारी   दुराग्रह ; वह   नेतृत्व - नायकों   की   है भम्रित ,  कलुषित ,  हेय   प्रज्ञा  !  आसमान   चिल्ला - चिल्ला   कर अपनी   उच्चता   का  ...

तब मैं किसान हूँ

                                               जब मैं सरकार की नीतियों की ‘सकारात्मक’ आलोचना करता हूँ, तब मैं किसान हूँ! जब मैं केवल विरोध के लिए  विरोध नहीं करता, तब मैं किसान हूँ ! जब मैं देश की सैनिक कारवाई के लिए सेना से प्रमाण नहीं माँगता, तब मैं किसान हूँ! जब मैं लोगों को भरमाने के लिए  झूठ बोल-बोल कर, कोर्ट में माफ़ी माँगने की  हरकतें नहीं करता, तब मैं किसान हूँ! जब मैं लोकसभा-राज्यसभा में  असम्मानीय व्यवहार कर, ‘राजघाट’ पर अनशन करने का  ढोंग नहीं करता, तब मैं किसान हूँ! जब मैं शाहिनबाग के प्रदर्शन-दर्शन को देश के विरूद्ध साज़िश के लिए  इस्तेमाल नहीं करता, तब मैं किसान हूँ! जब मैं प्रजातंत्र की मान्यताओं की बलि नहीं चढ़ाता, तब मैं किसान हूँ! जब मैं देश के मानचित्र, उसकी चौहद्दी  के सम्मान के लिए ‘सत् श्री अकाल’ बोलता हूँ, तब मैं किसान हूँ! जब मैं देश की एकता-अखंडता के लिए  क़ुरान की आयतें पढ़ता हूँ, तब मैं किसान हूँ! जब मै...