कविता को, जीवन को

         

         


चाहता हूँ,

कोशिश करूँ, करता रहूँ कि

कविता को जीवन,

जीवन की समग्रता दे दूँ,

कला नहीं, पूरा-पूरा जीवन दे दूँ ।


शिल्प-शैली-साँचें में फँसे बिना,

विचारों-वादों के ख़ेमे-खाँचे में जड़े बिना,

कविता को जीवन की

सुबह-शाम, दिन-रात,

श्रम-स्वेद-वेद, संघर्ष-सौंदर्य दे दूँ,

ती़क्ष्ण गर्मी, भीषण वर्षा,

शरद्-शीत, हेमंत-वसंत दे दूँ,

पीड़ा-हर्ष, तप-ताप,

राम-श्याम-कर्म-धर्म,

मान-मूल्य-मर्यादा-मर्म दे दूँ।


और, जीवन को

सीधे-सीधे कविता दे दूँ - 

कम-अधिक, स्याह-धवल,

शेष-अशेष कविता दे दूँ।


    - -                  सतीश,

                          18 दिसंबर, 2020. 




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