वे कहते हैं!
वे कहते हैं, -
दीप न जलाओ,
वे कहते हैं,-
पटाखा न छोड़ो!
और, भले-भोले, तुम,
यों, “हरा-भरा” हो जाओ!
“पर्यावरण” का ऐसा वरण,
एक विचित्र आवरण है!
यह पर्यावरण का अतिशय प्रेम है?
या, हमारे स्व और स्वत्व का,
संस्कृति की भाव-भंगिमाओं का,
परम्पराओं की निष्ठाओं का,
परिपाटियों की अभिव्यक्ति का,
धर्म की मान्यताओं का
अति परिचित, सुनियोजित हरण है?
वे कहते हैं -
मत जानो, तुम कौन थे,
मत पहचानो, तुम कौन हो,
मत सोचो, तुम कौन होगे!
वे कहते हैं -
अरे भाई, तुम ‘मूल’ नहीं,
“क़ाफ़िला” हो;
तुम “असभ्य” थे,
तुम्हें “सभ्य” बनाने
बेचैन, बड़े दिल वाली
संस्कृतियाँ आयीं ,
“मानवता” की पवित्र पोथियाँ ले-लेकर!
वे कहते हैं -
“धर्म अफ़ीम है”!
फिर, व्यग्र होकर हमें बताते-जताते हैं
कि एक ‘विशेष धर्म’ ही अफ़ीम है,
वह नाहक असम-विषम है!
और, वे अशेष रूप से
सम, समता के वाहक हैं!
वे कहते हैं-
“म” से माँ न कहना,
भारत माँ तो कभी न कहना!
कह सको तो, म से
केवल “मार्क्स” कहना,
मार्क्स भी नहीं, मार्क्सवाद कहना,
मार्क्सवाद भी नहीं, केवल मार्क्सवादी कहना!
वे कहते हैं-
तुम्हारा होना, होने की इच्छा रखना,
अपने आप को संरक्षित करना,
अपने धर्म-कर्म-मर्म को समझना
छोटा होना है, संकीर्ण होना है,
एक असंतुलित आग्रह है!
वे कहते हैं -
यही विधि है, यही विधान है,
यही प्रजातंत्र, यही तंत्र-मंत्र है,
यही व्यवस्था, यही संविधान है!
और, हम! यह सब
धन्य-मूर्धन्य, “सात्विक” होकर
सुनते-गुनते-बोधते रहते है!
वे कहते हैं,
कहते ही रहते है!
-सतीश
Nov 5, 2021.
वाह
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