“महादेव” कविता क्यों?

हमें “इज्जत” से कहीं परहेज़ नहीं,

पर, “सम्मान” को कैसे भूल जाऊँ? 

हमें “किरदार” से कोई हिचक नहीं,

फिर, “भूमिका” की भूमि क्यों खो जाये? 

हमें , चलो, “जरूरत” की आदत लगी रहे, 

पर, “आवश्यकता” को कैसे, कहाँ मिटा दूँ? 


संस्कृति के सहर्ष संचय में,

उसकी उत्सुक, उदार, उज्ज्वल गति-लीला में,

मानवता के श्रवण-गायन और मनन में

माना कि “खुदा-अल्लाह” की सात्विक पुकार होती रहे,

पर, किसी बोध-अबोध, किसी विचारधारा की

अतिशयता से ग्रस्त होकर 

“महादेव” की कविता होने, न होने का प्रश्न क्यों? 

अस्तित्व-अनस्तित्व के अति व्याकुल तर्क, 

बेचैन रोक-टोक क्यों? 


चोट से अधिक 

चोट की अनुभूति सघन होती है!


समय की देह पर, युगों के शरीर पर 

भावों की गहरी पपड़ियाँ पड़ी हैं, 

उन्हें पहचानने की, छीलने-हटाने की 

कोई आवश्यकता नहीं? 


— सतीश 

5 August, 2022. 


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