माँ
हमारी ग़लतियाँ, हमारी भूलें, हमारे नखरे, हमारी चिड़चिड़ाहट, हमारे क्रोध-क्षोभ - ये सब तुम्हारे जीवन-भूगोल के ऊँचे-नीचे टीले हो गये, तुम्हारे जीवन के क्रीड़ा-कलाप हो गये, तुम्हारे जीवन-यज्ञ के राग-जाप हो गये! माँ, तुम प्रकृति की सबसे सुंदर, सबसे सहज, सबसे सकर्मक, सबसे सुज्वलंत आहुति हो! तुम्हारे कर्म की बाँहें जीवन-धरती और जीवन-आकाश को आपस में जोड़ती क्षितिज-रेखा है, तुम्हारी कर्म-चेतना हर रोज़ ओस की बूँदें बनकर टपकती हैं, तुम भोर के शरीर में अपनी धमनियों के रक्त-रेशे, रक्त-राग देती हो, दोपहरी को अपने कर्म-ताप की तपतपाहट देती हो, तुम शाम के सूर्य को मर्यादा से लाल कर देती हो, अपनी प्रकृति-प्रवृत्ति से उसे स्निग्ध, रमणीय-दर्शनीय बना देती हो! मा...