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बेटी

बंद आँखों में  मौसम के सम-विषम को साधती बेटी; अंजलि-भर फूलों को सुंदर, साकार स्वप्नों में घोलती बेटी; प्रसन्न चित्त से समीप-दूर की हरियाली-सुरभियों को पढ़ती बेटी;  खुले मन से  जीवन के ओर-छोर को बाँधती बेटी; जीवन की भाषा-विधा  को  सुशब्दित, सुशिल्पित, प्राणित करती बेटी!  संक्रांति की वर्तनी को शुभ, उज्ज्वल सौन्दर्य देती बेटी!  समय का विधान कुछ भी हो,  जग-मानस पर नयी-नयी पहचान बनाती बेटी!  मौसम की बचपना हो या बचपना का मौसम, सबों में मज्जित हो अठखेलियाँ करती बेटी !  -सतीश  Jan 14, 2023. 

नया वसंत

इस नये वसंत का अभिनंदन है, यह “अभिनंदन” का नया वसंत है!  सरहद के ख़ंजरों से लेकर आम के मंजरों तक यह नई भंगिमा, नई महक, नये स्वाद का मौसम है। कुंठा, ग्लानि, हीनता-ग्रंथि और अकर्म के  शरद्-शीत के पार यह प्रकृति का रूप सुंदरतम है!  यह सरस्वती के शक्ति-रूप की नई कूक है, यह गीता के कर्म-श्लोकों की नयी हूक है, भारतीय अस्मिता के स्वरों-सुरों को तानता हुआ पंचम तान है, यह भारत और भारतीयता का नया वितान है! यह नये तेवर, नये अंदाज़, नये मिज़ाज की  मिली-जुली बोली है, इसमें नये रंगों, नये पुचकारों, नये खेलों की ख़ुश होली है!                      इस वसंत का सप्रणाम अभिनंदन है,           यह “अभिनंदन” का नया वसंत है!  इसमें परशुराम के परशु का नया आह्वान है, महाराणा प्रताप, चित्तौड़, चेतक की धड़कनों की ध्वनि है, इसमें मेवाड़ के जंगलों में दौड़ती  भारतीय इच्छा-शक्ति का योग-धर्म है। इसमें हल्दीघाटी की स्मृति की ख़ुशबू है, छत्रपति शिवाजी के इरादों के छत्रों की छाया है। इसमें महारानी लक्ष्मीबाई के अड...

जीवन की छतरी

धरती से दूर सूने में हम बह गये, कहीं छा गये, कहीं छूट गये,  कहीं ठहर गये, कहीं टूट गये,  कहीं जुड़ गये, कहीं छितर गये, कहीं फिसल गये, कहीं फहर गये,  कहीं तरल हुए, कहीं तर गये!  अनगिनत भावों की अपरिचित गलियों से विह्वल-अविह्वल हम गुज़र गये, गीत-अगीत के अटपटे, सुंदर मनुहारों से  विकल-अविकल, निच्छल भीग गये।  अनमने फ़ासलों को ढँकतीं,  यों ही दूरियों पर छाने के प्रयास में, कुछ अनोखी, अनजानी आस में भावनाएँ शून्य में स्वयं को ढूँढती रहीं, कभी शून्य को थामतीं, यदा-कदा शून्य-सी होती हुईं।  छतरी की अदला-बदली नहीं थी, उनका बेमेल ठौर भी नहीं था, सच पूछो तो, कहीं कोई न नियमन था, न कोई योजन था!  बस, केवल, जीवन का एक लघु, सम्पन्न कथ्य, मन की छोटी-सी तरल विधा, एक अन्तर्निहित धारा, एक समाहित भाव,  नियति की अनपहचानी दिशा, एक अद्भुत चय,  कुछ तय, कुछ अ-तय!  -सतीश  (March 11, 2023)

होली

तुम ऐसी और इतनी होली खेलो कि  सारी शिकन-शिकायत, नफ़रत-नाराज़गी, हिचक-क्षुब्धता ढ़ह जाये, बह जाये, दह जाये।  फिर, उदयाचल से अस्ताचल तक  प्रकृति के मुख-मेरू, वक्षपटल तक, सृष्टि के भाल से पदतल तक, सातों तलों से सातों अम्बर तक, मन के रोम-रेशों से कुंतल-केशों तक, जीवन के खर-पात से सिरा-शिखरों तक,  ग्रीष्म-शिशिर से पतझड़-वसंत तक, समुद्रों के अगम बहाव से पर्वतों के उभरे कसाव तक, रेतों-चट्टानों से मृत्ति-स्मृतियों-प्रवृत्तियों तक, वादों, विवादों, अर्थों-व्यर्थों-मान्यताओं तक, मन के सुदूर सूने तक, सन्नाटे तक रंग-रस, राग-रग, मद-मोद से भर दो, फुहार-फब्बारों-प्यार-पुचकारों से भर दो, अमंद नृत्य-नाद-निनाद, नव सुरव से भर दो, लोच-लचक, डोल-हिल्लोल, झूम-झमक दे दो! जीवन के पोर-पोर को, हरेक मोड़-मरोड़ को  ऐसा और इतना गुलाल-रंग दे दो कि लगे -  मन की यह सबसे स्पष्ट, बेबाक बोली है, सृष्टि ने अपनी सुंदरतम कृति सामने खोली है, यह होली है, जोली है, हमजोली है!  — सतीश  (March 12, 2017)  होली