संदेश

नकारें-नकारात्मकताएँ

आये दिन,  व्यवस्था और समाज की नकारें, सतत् उद्वेलित नकारात्मकताएँ सुनियोजित-प्रायोजित निराशाओं, लाभवंती हताशाओं से  आसक्त, आबद्ध हैं।  उनके प्रतिनिधि व्यक्तित्व  मान्य, उच्च मंचों के वक्ता और वक्तव्य ही नहीं, समय के शिल्प-साँचे में गहरे धँसे भूत, वर्तमान और भवितव्य भी हैं!  राज और सत्ताओं के वे स्वघोषित कुलदीप, वर-वरदान, वरद, वरिष्ठ होते हैं, स्वजनित अहम् से पूर्ण,  अपाच्य स्वार्थों से भरे, पूरे गरिष्ठ होते हैं।  उनकी सम्मोहक भंगिमाएँ, तथाकथित श्रेष्ठ व्यवसायिक छवियाँ आतंक और आतंकवाद में मानवता के आविष्कार के लिए द्रवित होती रहती हैं, वहीं देश के मूल कर्त्तव्यों के प्रति  निष्ठाहीन, कुंठित, लुंठित, विकृत बनी होती हैं!  उनके   चिरायु   चिंतन   की   चक्षु - दृष्टि   “ शुभ   लाभ ”  की   उपजाऊ   नीतियों   के   संवेग   से   प्रेरित   होकर विचार   और   कर्म   के   पक्ष   या   विपक्ष   के   वरण   या   हरण   की   ओर  ...

“गिरना” !

चारों ओर, गिरने की होड़ लगी है; गिरना पथ है, पायदान भी, अपने आप में एक अभीष्ट लक्ष्य भी!  समाज में, पत्रकारिता, राजनीति में,  संस्थाओं, व्यवस्थाओं के रूपों, अपरूपों में, साहित्य और कला में,  उनकी मोहक-सी छवियों, भंगिमाओं में  “गिरने” की अपनी-अपनी भाषाएँ-बोलियाँ हैं, बहुआयामी उपजाऊ व्याकरण भी !  बहुत बार, “गिरना” एक पुरस्कार है!  एक सोची-समझी मानसिकता,  एक सोद्देश्य व्यसन,  एक लाभकारी उद्योग,  एक सुनियोजित अभियान है!  अब,  गिरना मन के भीतरी स्तरों, तारों को  टटोलता, टोहता हास्य नहीं, कोई कचोटता व्यंग्य भी नहीं, बल्कि,  समय का एक दारुण तथ्य है, चतुर्दिक फैला  चेतना के अवसान का अंतहीन, करूण कथ्य है!  - सतीश  Nov 24, 2022. 

थाती के पद-तले

हर ओर, हम अपनी थाती को तौल-तराज़ू  पर चढा़ने-उतारने में लगे हैं। जिनने अपना जीवन ही  मातृभूमि को अर्पित कर दिया, हम उनकी नोंच-चोंथ में व्यस्त हैं!  ऐसा , संभवतः, इसलिए है क्योंकि  हम अपनी कर्त्तव्यहीनता की कुंठा से  ग्रस्त हैं, भीतर-ही-भीतर  अपनी न्यूनता से त्रस्त हैं;  हमारी क्रियाएँ सिर उठा कर चल नहीं सकतीं, अपनी रीढ़ पर खड़ी हो नहीं सकतीं, एक-दो डग-पग भी तरीक़े से रख नहीं सकतीं, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता के बड़े अर्थों को  अपने चरित्र के व्यक्तित्व में धर नहीं सकती!  असली, भीतरी सच तो यही है कि स्वयं का स्वयं से साक्षात्कार  एक वास्तविक आवश्यकता है-  अपने आप को सही रूप से आँकने की, पहचानने की, कुछ आकलन की, कुछ अवलोकन की, निर्विकार अपनी थाती के पद-तले बैठने की, सकारात्मक कर्म-धर्म के छोटे-से-छोटे रूप से ही सही कुछ जुड़ने की, कुछ बँधने की!  क्या हम कर सकेंगे,  इतना भी? इतना ही?  अपने लिए, अपनी थाती के लिए?  अपने भविष्य के लिए?  ⁃ सतीश  Nov 20, 2022.

कार्तिक की धूप

कार्तिक की हल्की-हल्की, मद्धिम-मद्धिम, पतली-पतली धूप तन को ताप से भरती, मन को उष्मा-ऊर्जा देती, उसे थपथपाती-जगाती, उमेठती-उमगाती, आलस्य-आवरण को उत्फुल्लता से उघाड़ती! सूरज की नरम-नरम किरणें आसमान के ओर-छोर को  उम्मीदों से बाँधतीं, फूलों-पत्तियों-लतिकाओं से अठखेलियाँ करतीं, उन्हें जीवन-तत्व देतीं, उनके जीवन में अपने आप को घुलातीं-मिलातीं! ठिठुरते-सकुचाते पेड़-पौधे-वृक्षों को जीवन-सान्त्वनाएँ और संभावनाएँ देतीं!  दिन की हवा की ठंडक को धीरे-धीरे, थोड़ी-थोड़ी गर्मी देती; मौसम के सर्द व्यवहारों को  शनै: शनै: शालीनता सिखाती - कार्तिक की धूप ! अपने ही तौर-तरीक़े से क्षुब्ध हो सिहरते-काँपते, शीत होते वातावरण को सहज ढ़ाढ़स देती - कार्तिक की धूप !  सतीश  Nov 28, 2020. 

He says!

He says "We will Free Iran" He says "We will hand over Afghanistan to Taliban"! He says "We go to Ukraine"! All this for Democracy in the world! And, His Vice Laughs it out, Laughs it over, Laughs it away! All this together is: "The Audacity of Hope"!  ⁃ Satish Nov 5th, 2022. 

मोरबी का पुल

हमारी व्यवस्था में पुल का टूटना एक घटना नहीं, बल्कि, प्रजातंत्र के जीवन की  एक अभिशप्त प्रक्रिया है! प्रक्रिया जिसने अब तक हमें बताया कि  आसमान के तारे,  युग-युग के नारे -  ये सब व्यर्थ हो गये, कहीं जूठे हो गये, या फिर झूठे हो गये !  एक प्रक्रिया जिसमें  लोगों की मौतें  राजनीति की गोटियाँ हो गयीं!  एक प्रक्रिया जिसमें  मौतें तो जीवन ले गयीं; पर, उसके बाद की व्यग्र बहसों, असंतुलित विवरणों. विकृत आकलनों, घटाटोप विश्लेषणों की छाप और माप  जीवन के मूल्यों, उनके उद्देश्यों को ही  गहरे रूप से स्याह कर गयीं!  यों, मोरबी का पुल केवल एक स्थिति,परिस्थिति नहीं, व्यवस्था के व्याधों का विन्यास हो गया,  उनकी व्याख्या हो गया;  पुल की टूट  एक मानसिकता, एक प्रवृत्ति की  अरोक कहानी हो गयी;  और,  प्रजातंत्र के रेशे-रेशे में समा गयी!  ⁃ सतीश  5th Nov, 2022

अशफाक के जन्म-दिन पर

स्पष्ट ध्येय से आसक्त अर्पण को, क्या  कहूँ इस एकनिष्ठ समर्पण को? नमन और कृतज्ञता के हर शब्द अशक्त हैं; कुछ और नहीं,  देश-कर्म-धर्म ही है एक लघु तर्पण ! ⁃ सतीश   Oct 23, 2022.