नकारें-नकारात्मकताएँ
आये दिन, व्यवस्था और समाज की नकारें, सतत् उद्वेलित नकारात्मकताएँ सुनियोजित-प्रायोजित निराशाओं, लाभवंती हताशाओं से आसक्त, आबद्ध हैं। उनके प्रतिनिधि व्यक्तित्व मान्य, उच्च मंचों के वक्ता और वक्तव्य ही नहीं, समय के शिल्प-साँचे में गहरे धँसे भूत, वर्तमान और भवितव्य भी हैं! राज और सत्ताओं के वे स्वघोषित कुलदीप, वर-वरदान, वरद, वरिष्ठ होते हैं, स्वजनित अहम् से पूर्ण, अपाच्य स्वार्थों से भरे, पूरे गरिष्ठ होते हैं। उनकी सम्मोहक भंगिमाएँ, तथाकथित श्रेष्ठ व्यवसायिक छवियाँ आतंक और आतंकवाद में मानवता के आविष्कार के लिए द्रवित होती रहती हैं, वहीं देश के मूल कर्त्तव्यों के प्रति निष्ठाहीन, कुंठित, लुंठित, विकृत बनी होती हैं! उनके चिरायु चिंतन की चक्षु - दृष्टि “ शुभ लाभ ” की उपजाऊ नीतियों के संवेग से प्रेरित होकर विचार और कर्म के पक्ष या विपक्ष के वरण या हरण की ओर ...