राजनीति 2025!
राजनीति 2025! राजनीति प्रजातंत्र को जो कुछ देती है, वो गुण है या अ-गुण? सगुण या निर्गुण? विष या निर्विष? विकार या निर्विकार ? कुछ समझ नहीं आता। ऊँची दिखने वाली राजनीति भी उचक-उचक कर ओछी रह जाती है, छोटेपन में ढुलक जाती है! लुभावने वादों, सुहाने दावों के बीच ग़रीबों के घोषित हित के लिए आतुर राजनीति अपने चरित्र को “नगद” बेचती रहती है; वह “मुफ़्त” में गिरती रहती है, वोट के लिए, वोट के नाम पर, वोट की वेदी पर, पूरी वेदना के साथ! चतुर आत्म-रोदन के साथ! बेतरतीब, बिकाऊ क्रन्दन के साथ! विवशताएँ राजनीति का शृंगार-रस होती हैं! वह अपने गिरने को यथार्थ बताती रहती है; “गिरने” को समाज में उठने-उठाने का मंत्र मानती है! राजनीति बन गई है जाति-धर्म की इकाई, खूनी की स्याही, निर्मम वध-पट्टी कसाई की। “यह “महिला” का नया वोट-बैंक है”, “यह इस-उस जाति की काट है”, - ऐसे सुडौल, फुर्तीले, तर्क व अमोल ज्ञान-सागर में डुबकी लगा कर पवित्र हुए ऐसे अमोघ विश्लेषण समाज और व्यवस्था को, उ...