संदेश

सूरज और दीप-ज्योति

 सूरज,  तुम आते हो बड़े क्षितिज पर, आसमान में हो उठते-चढ़ते !  पर, मैं बैठती हूँ धरती पर, छोटे-से-छोटे द्वार, देहरी पर,  अट्टालिकाओं से झोपड़ियों तक,  मान्य से सामान्य तक,  जलती हूँ, उजलती  हूँ। मुझे प्राची-पश्चिम का भेद नहीं, उत्तर-दक्षिण का ज्ञान नहीं;  कोई अतिशय ताप नहीं, तिलमिलाहट, तपतपाहट नहीं ; भोर हो, या साँझ,  दिन हो या रात, मैं जलती ही रहती हूँ।  अँधेरों से मैं नहीं छिपती, उनसे मुँह कभी नहीं मोड़ती; अमा का व्यक्तित्व  चाहे जितना भी घना हो,  मैं उसकी छाती पर  जलना नहीं भूलती!  तुमको हिचक होगी  मुझ तक आने में, पर, तुम चाहे जिधर रहो, मैं पूजा की थाली में,  तेरी वेदी तक आती हूँ!  अपनी माटी, अपनी बत्ती पर टिककर अपनी अस्मिता का बोध लिए, सभ्यता-संस्कृति की  अपरिमित, अमिय, अप्रतिहत आभा लिए  शिवरूपा, सुंदररूपा, सत्यरूपा,  मैं उज्ज्वलता की बाला हूँ; दीपों से दीपों को सजाती, मैं दीप-श्रृंखला, दीपों की माला हूँ; जीवन की गति और विराम को राममय, रामलय करती मैं दीपावली हूँ! हे सूर्य-देव, मेरे अस...

वे कहते हैं!

वे कहते हैं, - दीप न जलाओ, वे कहते हैं,- पटाखा न छोड़ो! और, भले-भोले, तुम, यों, “हरा-भरा” हो जाओ!   “पर्यावरण” का ऐसा वरण,   एक विचित्र आवरण है!   यह पर्यावरण का अतिशय प्रेम है?   या, हमारे स्व और स्वत्व का,   संस्कृति की भाव-भंगिमाओं का,   परम्पराओं की निष्ठाओं का,   परिपाटियों की अभिव्यक्ति का,    धर्म की मान्यताओं का     अति परिचित, सुनियोजित हरण है?  वे कहते हैं - मत जानो, तुम कौन थे, मत पहचानो, तुम कौन हो, मत सोचो, तुम कौन होगे!  वे कहते हैं - अरे भाई, तुम ‘मूल’ नहीं,  “क़ाफ़िला” हो;  तुम “असभ्य” थे, तुम्हें “सभ्य” बनाने  बेचैन, बड़े दिल वाली  संस्कृतियाँ आयीं , “मानवता” की पवित्र पोथियाँ ले-लेकर! वे कहते हैं -  “धर्म अफ़ीम है”!  फिर, व्यग्र होकर हमें बताते-जताते हैं कि एक ‘विशेष धर्म’ ही अफ़ीम है, वह नाहक असम-विषम है!  और, वे अशेष रूप से  सम, समता के वाहक हैं!  वे कहते हैं-  “म” से माँ न कहना, भारत माँ तो कभी न कहना! कह सको तो, म से  केवल “मार्क्स” कहना...

तुलसीदास

हे कविप्रभु! हमने कविताएँ लिखी, तुमने संस्कृति लिख दी; हमने कविताओं में जगने की आस देखी, रखी, तुम जागृति बन गये; औरों ने काव्य के पौध उगाये, तुमने ‘तुलसी’ रोप दी!  तुम किसी सत्ता के मनसबदार नहीं बने, सबों के मन में समा गये; जब धर्म निराश-हताश था, तुमने उसे राममय, संजीवन कर दिया।  तुमने रचना को मर्म ही नहीं, कर्त्तव्य-कर्म, क्रिया-धर्म दिया; शब्द-शब्द, अक्षर-अक्षर को  मर्यादा-मान का संकल्प-छंद दिया; तुम्हारी कविता-कला शिल्प नहीं, कल्प, कल्प-बोध हो गई,  फिर, कल्पांतर, कल्प-आत्मा हो गई। प्रभु को समझते-परखते-गाते हुए, देखते-लिखते हुए, तुम एक काव्य-सत्ता ही नहीं, समाज-संस्कृति-जीवन-संप्रभु हो गये।  -सतीश  Oct 31, 2021. 

ये पढ़े-लिखे लोग!

बड़ी संख्या में, पढ़े-लिखे लोग  भ्रष्ट नहीं होते,  सच कहिए, तो, वे भ्रष्टाचार होते है!  कई बार, वे  झूठ का भूगोल-खगोल गढ़ते हैं, चिंतन-दर्शन, तर्क-वितर्क, विवरण-विश्लेषण  की  निरंतर पैंतरेबाज़ी के साथ  वे ऐसे तारे-सितारे आसमान में बसाते हैं  जिनकी तेज-शक्ति  वसुधा को न तो भाती है, न लुभाती है। वे लगे रहते हैं, सूर्य-चाँद को रोकने-टोकने में; सूर्य को तिलमिलाता हुआ बताने में, चाँद को “अकारण शीतल” सम्बोधित करने में; उनकी कहानी होती है, हानि-लाभ की सघन आत्म-अभिव्यक्ति , सुंदर-सजीले समीकरण की मोहक मनोवृत्ति! और, अरे, कलाओं-कविताओं, गीतों-ग़ज़लों का क्या कहना?  वे भरी सभा में खुलेआम बिकते हैं; किन-किन की बोली-टोली पर, किन-किन की आँख-मिचौनी पर, वे नत-विनीत होकर, कभी मन से, कभी अनमने होकर जहाँ-तहाँ, बार-बार  सोते-जगते, उठते-गिरते हैं!  सतीश 30 Oct, 2021. 

ग़ुलामी, चाहे-अनचाहे!

ग़ुलामी के गुल बड़े मोहक होते हैं,   हम में से कुछ उनके “सुवास” में  बँधे होते हैं, बँधे रहना चाहते हैं,- आमूल, अनवरत, आजीवन!   ग़ुलामी के वृक्ष बड़े ऊँचे होते हैं,   विविध प्रकार, आकार, विस्तार के, बड़ी- बड़ी छाया वाले, बड़े-बड़े फल वाले, विशद जड़ वाले, गहरी जड़ता वाले; वे धरती को पकड़े रहना जानते हैं, आसमान की ओर उचकना भी जानते हैं; उनकी भंगिमाएँ, उनकी छवियाँ, शिक्षा-परीक्षा-मनोभावनाएँ,  अद्भुत कामनाएँ, ‘मनोहारी’ कुंठाएँ दूर-दूर तक हमें जकड़ती हैं-  चाहे-अनचाहे, समय-असमय!        -सतीश  Oct 26, 2021. 

बड़े-बड़े पेड़

ऊँचे पर्वत से घिरी घाटी से गुजरते हुए दिखा कि बड़े-बड़े, लम्बे-लम्बे पेड़ उनकी देह पर तने थे।  लगा कि इन्हें देखकर  विज्ञान कहता :  ये सूर्य की रौशनी की खोज में ऊपर जा रहे हैं !   फिर, मन के भीतर कहीं से आवाज़ आयी- कि इन्हें देखकर धर्म कहता - यदि इन पेड़ों ने अपने अंतस्तल में उज्ज्वलता-उष्णता का एक लघु खंड भी बसा लिया होता,  तो, संभवत:, उन्हें  ऊँचे से ऊँचे की होड़ में, बेचैन आपाधापी में शामिल नहीं होना पड़ता!  प्रकृति-कृति-संस्कृति कहती है  कि हम अपने मन के भीतर  विज्ञान और धर्म की यह बातचीत   होने दें, होते रहने दें!  -सतीश  Oct 22, 2021. 

शरद पूर्णिमा का चाँद!

कहते हैं, शरद पूर्णिमा का चाँद सोलहों कलाओं से पूर्ण होता है; सोलहों कलाएँ!  कलाएँ  जिनकी चाँदनी  आकाश से गलबाहियाँ-ठिठोलियाँ  करती रहती है; चारों ओर घूम-घूम कर, इतराकर-इठलाकर,  अपने तन-मन में तन्मय होकर, अपने आप को सजाती, निहारती, धवल करती रहती है। पर, ऐ चाँद,  एक छोटी-सी बात तुम भूल गये  कि आकाश से सटे रहने की कोशिशों में  कभी-कभी तुम पूरे होते हो, कभी कटे-कटे, कभी आधे,  कभी अधूरे होते हो!  अच्छा होता,  यदि तुम धरती के पास उतर जाते, हर मन में बैठ जाते, थोड़ी देर के लिए भी अटक जाते,  धरा की धूल, धुँआ से खेलते-हँसते उजल जाते,  कुछ क्यारियों को अपनी रौशनी से पाट देते,  वसुधा को तुम्हारी  अमिय-प्राणमयी चाँदनी मिल जाती!  ऐसे में, सचमुच, तुम पूर्ण हो जाते एक बार के लिए नहीं - हर दिन, हर रात के लिए, हर भोर, हर साँझ के लिए, हर माह, हर ऋतु के लिए, हर घर, हर मन के लिए! तुम पूर्णतर होते जाते तुम पूर्णतम हो जाते!  और, तब, शरद का होना  कुछ और स्पष्ट,  कुछ और स्वच्छ हो जाता!  ⁃ सतीश    ...