संदेश

दिल्ली और “पानी”!

दिल्ली और “पानी”!  दिल्ली को “पानी” नहीं सुहाता! वह पानी के बिना तड़पती रहती है, उसके वातावरण का तापमान बढ़ जाता है; पर, पानी को देख वह बेचैन हो जाती है, अस्त-व्यस्त, त्रस्त-ग्रस्त हो जाती है, वह अति विह्वल हो जाती है, डूब जाती है,  अपने मन की वीभत्सता को सड़क पर परोस देती है, सहजता के साथ, बिना किसी रोष के!  कभी पानी की खोज में, कभी पानी से भीग कर  वह पवित्र भावना से आमरण अनशन करने लगती है, बड़े भोले भाव से  “जंतर-मंतर” की मुद्रा-शिला पर अपनी रीढ़ को तानने का  व्यायाम करने लगती है!  मानता हूँ, दोष पानी का है,  पानी के आने और नहीं आने का है, पानी का पानी होने और नहीं होने का है,  दिल्ली का नहीं!  सदैव मानता हूँ!  -सतीश  29 जून, 2024. 

हत्या और हत्यारे

हत्या और हत्यारे  - -  ख़ेमों-खाँचों में पड़कर, या चौखटों में अटक कर,  अगर-मगर की पकड़ में जड़ होकर जब-जब हम हिंसा की प्रत्यक्ष निंदा नहीं करते, हम हिंसा करते हैं!  जब-जब नेता-प्रणेता, लेखक-पत्रकार-साहित्यकार  अपनी कुंठाओं को सुलगा-सुलगा कर आयोजित, प्रायोजित-अप्रायोजित कुतर्कों को गढ़ते हैं, विवरणों-बहसों, तथ्यों, तत्वों को असत्य से मढ़ते हैं वे हिंसा-प्रतिहिंसा करते हैं!  संसद हो या सड़क, गोष्ठी हो या न्यायालय, वाम हो या दक्षिण, या विचारों का कोई अन्य घोषित-अघोषित कुनबा, जब-जब विचारधाराओं की अतिशयताएँ  आत्मा और विवेक की गूँजों को नहीं सुनतीं, वे कहीं-न-कहीं, कोई-न-कोई हिंसा करती हैं!  जब-जब निष्ठाएँ सत्कर्म से बड़ी हो जाती हैं, जब-जब खूँटों की प्रतिज्ञाएँ हमें आदर्शों के  उज्ज्वल स्वरों से दूर हाँकने लगती हैं, हम हिंसा-प्रतिहिंसा करते हैं, करते रहते हैं!  जब-जब हम शांति के कबूतरों को गिद्धों का पंजा पहनाते हैं, हम हिंसा करते हैं, कर रहे होते हैं!  यों, चतुर्दिक हत्यारे हैं हेर रहे  प्रजातंत्र की आत्मा को  सीधी-टेढ़ी नज़रो...

यों हम सभ्य हुए

यों हम सभ्य हुए  जब हम सभ्य हुए  माता-पिता हाशिये पर आ गये, बच्चों के लिए हम “पसरते” गये!  जब हम सभ्य हुए  पेड़-पौधे कटते गये,  नदी सिमटती गई, शहर फैलता गया!  जब हम सभ्य हुए  महत्वकांक्षाएँ बड़ी होती गईं, उनके मान-महत्व बौने होते गये!  जब हम सभ्य हुए  सफलता-असफलता के मूल उद्देश्य छिपते गये,  सोपान, मील-मंजिल, पड़ाव अनगिनत हो गये!  जब हम सभ्य हुए  धर्म की चेतना छोटी होती गई, धर्म का व्यापार बढ़ता गया!  जब हम सभ्य हुए  राजनीति अपराध, विपदा होती गई, संसद रोर-शोर से भरी ठगी का चौपाल हो गया! - “लोकतंत्र”, “संविधान”, “विकास” और “धर्म” की  बेचैन लड़ाई लड़ते-लड़ते!  जब हम सभ्य हुए  पत्रकारिता राजनीति का पीड़ित कंदुक हो गई! आत्मा के व्याकुल आलोड़न के साथ वह कभी किसी के विरोध का बेशर्म औजार,  कभी अचानक, अनायास प्रशंसा की रंगीन पिचकारी बन गई!  जब हम सभ्य हुए  जीवन कहीं फिसल सा गया, कविता-कहानी-ग़ज़ल-गीत बड़े होते गये!  -सतीश  30 जून, 2024 

सूर्य

सूर्य हे   सूर्य   देव ! आकाश   में   रहकर   भी   धरती   के   कोने - कोने   तक   पहुँचने   की   तुम्हारी   इच्छा - शक्ति   नमस्य   है !  आकाश   में   एक   लघु   आकार   में   आकर   भी तुम   पूरे   संसार   में   छा   जाते   हो !  इसलिए ,  तुम   आराध्य   हो !  धरा   पर   रहकर   भी   हम   उसकी   ओर   मुड़   नहीं   पाते , ग्रीवा   को   झुका   नहीं   पाते , कुंठा   की   पैनी   जकड़   को   ढीली   कर   नहीं   पाते , “ अहम् ”  से  “ हम ”  की   ओर   बढ़   नहीं   पाते , सात्विक   रूप   से   जल   नहीं   पाते ,  उजल   नहीं   पाते !  सतीश   Nov 21/28 2023 ( छठ   पूजा   के   उपरांत )

भ्रष्टाचार की डिग्री!

भ्रष्टाचार की डिग्री! सोचता हूँ, सोचता रहता हूँ कि भ्रष्टाचार की “डिग्री” क्या होगी?  उसकी रूप-छवि कैसी होगी?  उसकी आकृति, उसकी कृति क्या होगी?  वह उच्चतम संस्थानों में पढ़ी-लिखी होगी?  पूरी “शिक्षा-दीक्षा” के साथ तकनीकों से लैस होगी?  वह कभी स्वघोषित “लोकपाल”,  कभी स्वयं भ्रष्टाचार हो जाती होगी?  वह कभी पत्र-पत्रिकाओं में  बड़े-बड़े दावों के साथ छपती होगी?  कभी उन्हें ख़रीदती होगी, कभी स्वयं बिकती होगी? वह चारा के “क्रांतिकारी” नायकों के साथ  “सुशासन” और “विकास” की परियों की  “सम्पूर्ण क्रांति” की परिकथाओं में मग्न हो आमोदपू्र्ण  गलबाँहियाँ  करती होगी?  क्या  वह प्रजातंत्र के पुनीततम परिसर में आतंको के नृशंस अनाचारों के पक्ष में अश्लील रूप से ठहाके लगाती होगी? वह सेना से उसकी कारवाइयों के लिए प्रमाण-पत्र माँगती होगी ? सोचता हूँ, सोचता रहता हूँ कि भ्रष्टाचार की “डिग्री” क्या होगी?  उसकी रूप-छवि कैसी होगी?  उसकी आकृति, उसकी कृति क्या होगी?  ⁃ सतीश  April 29, 2023. 

भगत सिंह जी

भगत सिंह जी  तेरे बलिदान की भाषा में देश, जीवन और कला को  समर्पण के नव गीत-संगीत, नये संजीवन शृंगार मिले!  राष्ट्र-यज्ञ में तेरी ज्वलंत आहुति से  भारत माँ को नया अभिसार मिला, उसके चरणों को नई छाप, नई पहचान मिली, उसके मन का उद्वेलन पाप नहीं, पुण्य हो गया;  भावनाओं से तप्त होना तब अपराध नहीं रहा, वह युग-युगों के पार जाता पुनीत बोध बन गया; देश के मन-मिज़ाज को तेरे रक्त से आसक्त भंगिमा मिली, स्वतंत्रता के क्षितिज पर राष्ट्र-ह्रदय की धड़कनों को, जीवन के मर्म-कर्म की परत-परत को,  नई हूक, नया स्वत्व, नया रागत्व मिला!  -सतीश  मार्च 23, 2024.  (शहीद-दिवस के अवसर पर)

एक जीवन-खंड, एक जीवन !

 एक जीवन-खंड, एक जीवन ! उन आँखों के घुमाव की अल्हड़ फुर्ती, ओठों पर मुस्कुराहट की छोटी सी आहट, फिर, एक खुली, खिली, चौड़ी हँसी!  सुंदर भौंहों की प्रसन्न उठान, चहकते हुए उनका वक्र होना,  सुमधुर भावनाओं के भार से आनंद-सिक्त होकर  थोड़ा नीचे आ जाना, स्मृतियों के आर-पार जाती  प्राणवती पुतलियों की सतेज धार; काजल के सजल भावों की उज्ज्वल भंगिमा!  गालों की हड्डियों पर सौन्दर्य के टीले का अलमस्त चढ़ाव! तबियत से खुली, उद्विग्नता-रहित पीठ को थपथपाती, उत्साह-उमंग और विश्वास से भरती, रह-रह कर फहरती, छहरती केशमाला !  धरती के गुरुत्व से परे  मन के बीचोंबीच लयपूर्ण वलय बनाती, अपनी आकर्षण-परिधि गढ़ती, समय-शरीर को ह्रदय की उष्णता देती  संक्षिप्त क्षणों की एक विस्तृत अनुभूति ! - यह है एक जीवन-खंड, या कि एक सकल जीवन!  ⁃ सतीश  14 जनवरी, 2024