संदेश

अनुभव

“अनुभव” के भव, प्राय:, “अनु” नहीं होते,  वे भाव-भवों से, भव-भावों से भरे-भरे होते हैं!   उनकी मिट्टी जीवन से सनी होती है,   उसपर अनगिनत पहाड़, नदी, समुद्र   टापू-टीले और तट होते हैं; अनेकानेक रेत तने होते हैं, चाहे-अनचाहे   विशद रूप से दूर-दूर तक फैले होते है!

क्या करूँ ईश्वर ?

क्या करूँ ईश्वर ?  क्या करूँ, ईश्वर?  ज्ञान पूरा है नहीं, भक्ति भी अधूरी ही है, संशय सघन बना रहता है, वो बार-बार डुबो देता है!  पर, ऐसे में जो कुछ है, छोटा-बड़ा, लघु-अलघु, श्वेत-श्याम, निम्न-अनिम्न, न्यून-अन्यून, ग्रस्त-अग्रस्त, श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ, सिक्त-असिक्त,  आसक्त-अनासक्त, कुंठा-अकुंठा- सबकुछ तेरे चरणों पर धर देता हूँ!  क्षमा करना! नमन और नमन!  -सतीश  मार्च 9, 2025

ये फूल ! -

ये फूल ! -  कोमल टहनियों पर भी टिक जाते हैं, हल्की पत्तियों के संग भी हो लेते हैं, मुलायम लतिकाओं पर चढ़कर लहराने लगते हैं, अस्थिर हवा में भी मुस्काते होते हैं!  बिना किसी चिंता के, बिना चिंतन-मनन् के, बिना उलझन के, बिना उलाहना के!  न जाने कैसे?  कैसे-कैसे?  ⁃ सतीश  मार्च 2, 2025. 

कविता से चिढ़ हो जाती है!

कविता से चिढ़ हो जाती है!  कभी -कभी कविता से, अपनी ही कविता से चिढ़ हो जाती है।  कविता बड़ी हो जाती है, हमारा जीवन छोटा हो जाता है, छोटा ही रह जाता है; पर, ऐसा ही क्यों?  हम इतने अभिशप्त क्यों हैं?  हम इतने कर्मविहीन क्यों हैं?  हम इतने निम्न, इतने ओछे, असमर्थ क्यों हैं? #दिल्ली_रेलवे_स्टेशन #delhirailwaystation  #DelhiStampede ! ⁃ सतीश  फ़रवरी 16, 2025

परिचय-अपरिचय

परिचय - अपरिचय क्यों   होता   है   ऐसा   कि   जिस   गली   से   गुजरता   हूँ , जिस   सड़क   से   होकर   जाना   चाहता   हूँ , उसका   नाम   भूल   जाता   हूँ , घरों   का   पता   भूल   जाता   हूँ ?  यह ,  सचमुच ,  घोर   अपरिचय   है , या   परिचय ,  परिचय   का   प्रक्रम  ?  परिचय   के   बोध - अबोध ?  सतीश   मार्च  1, 2025

बहुत बार

बहुत बार  जब कविता को तन देता हूँ, मन देता हूँ, पोशाक पहनाता हूँ,  एक अनुभूति चुपचाप उठती है कि  भीतर ही भीतर  कुछ अर्द्धनग्न, नग्न सा हो गया; बहुत बार !  अंतस् के गहरे विन्यास में मानो  कुछ उघड़ गया, उघड़ता गया,  कुछ छिल गया, छिलता गया बार-बार,  बहुत बार!  क्या यह मनुष्य बनने की क्रिया है? मनुष्य बनते रहने की प्रक्रिया है?  छुअन के चिन्ह बड़े होते हैं,  पर, अछुअन के चिन्ह और भी बड़े होते हैं, बहुत बार!  अभिव्यक्ति बड़ी होती है, पर, जो अनकहा रह गया, उसकी उमेठती ऊर्मियाँ और भी सघन, तीक्ष्ण होती हैं,  बहुत बार!  ⁃ सतीश  मार्च 1, 2025

राजनीति 2025!

राजनीति 2025!  राजनीति प्रजातंत्र को जो कुछ देती है, वो गुण है या अ-गुण?  सगुण या निर्गुण?  विष या निर्विष? विकार या निर्विकार ?  कुछ समझ नहीं आता।    ऊँची दिखने वाली राजनीति भी उचक-उचक कर ओछी रह जाती है, छोटेपन में ढुलक जाती है!  लुभावने वादों, सुहाने दावों के बीच  ग़रीबों के घोषित हित के लिए आतुर  राजनीति अपने चरित्र को  “नगद” बेचती रहती है;  वह “मुफ़्त” में गिरती रहती है, वोट के लिए, वोट के नाम पर, वोट की वेदी पर, पूरी वेदना के साथ!  चतुर आत्म-रोदन के साथ!  बेतरतीब, बिकाऊ क्रन्दन के साथ!  विवशताएँ राजनीति का शृंगार-रस होती हैं!  वह अपने गिरने को यथार्थ बताती रहती है; “गिरने” को समाज में उठने-उठाने का मंत्र मानती है!  राजनीति बन गई है जाति-धर्म की इकाई,  खूनी की स्याही,  निर्मम वध-पट्टी कसाई की।  “यह “महिला” का नया वोट-बैंक है”,  “यह इस-उस जाति की काट है”, -  ऐसे सुडौल, फुर्तीले, तर्क व अमोल ज्ञान-सागर में डुबकी लगा कर  पवित्र हुए ऐसे अमोघ विश्लेषण  समाज और व्यवस्था को, उ...