संदेश

दिसंबर, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कला-अभिव्यक्ति (The Kashmir Files)

कला की जलती बाती में, अंतत:,  इतिहास की आँखें खुली, भूगोल की जीभ हिली, समय-देश को गूढ़-गहरी वेदना मिली!  देश में सुनियोजित विशद आतंक की त्रासदी, चीख़ों, पुकारों, पीड़ाओं को, राष्ट्रीय चेतना के दुर्भाग्यपूर्ण, भयानक, गंभीर घावों को, रूप और स्वरूप मिले,  परख और पहचान मिली; वर्षों से छिपी, छिपाई हुई भूली-भुलाई हुई निर्मम व्यथाओं,  आहत, असहाय संवेदनाओं को, घातों, आघातों को, चित्कारों, हाहाकारों को, देश-व्यवस्था के क्रूर शत्रुओं के खूनी पंजों, उनके अभेद्य यंत्र-तंत्र की भूमिकाओं को खुली अभिव्यक्ति, असली थाती मिली!  कला की जलती बाती में! -सतीश  Dec 27, 2021 San Jose, California. 

घर और बाहर

घर से निकल कर दूर जाना तन और मन के  रंग-भावों के लिए अच्छा होता है; फिर, वापस घर लौटना और अच्छा लगता है!  दूर और समीप एक दूसरे से अलग नहीं, यह एकता है बाहर और भीतर की, ऐकिक, समग्र भाव-पक्ष!  -सतीश  26 Dec, 2021. 

अँधेरे की धमकी

अँधेरे की धमकी  होती है कि तिमिर-राशि हमेशा बनी रहती है,  तम का साम्राज्य सबों पर हावी है। पर, जिसे उगने-डूबने की आदत है, जिसके स्वभाव में, स्व भावों में बार-बार ढँक जाने पर भी निखर कर उभर आने की प्रवृत्ति है, उसे इनका बंधन क्यों ? उलझन क्यों, उद्वेलन क्यों?  रोक-टोक स्वीकार क्यों?  ⁃ सतीश        26 Dec, 2021

ऐसा आना-जाना

पूजा-स्थली  में  आने-जाने की हमारी भाव-ढंग-शैली  निराली होती है। हम अपने मन के भीतर भी आया-जाया करें, कुछ इधर-उधर, कुछ इस-उस कोने में  थोड़ा-अधिक, सीधे-तिरछे अवलोकन, आकलन किया करें!  भोर की विनम्र धूप, चाँदनी के शीतल व्यवहारों से, दोपहरी की तेज-तप्त भाव-किरणों, संध्या की सलज्ज सिकुड़न से अंतर-अंतरालों को भरा करें! -सतीश  26 Dec, 2021

एक छोटी-सी बात

एक छोटी-सी बात कि भोर की धूप में बैठ लूँ, उजालों की कथाओं से स्वयं को सेंक लूँ! हमेशा कुछ लोग, कुछ तत्व बने रहते हैं जिन्हें रात की प्रतिभाएँ, कलाएँ, शक्तियाँ, प्रवृत्तियाँ, मनोवृत्तियाँ, प्राप्तियाँ, निर्मितियाँ, मोहित करती हैं। पर, उनकी चिंता-व्यथा से दूर, पीड़ा-खरोंचों से अलग, विचारों-तर्कों की छीना-झपटी से परे प्रकाश की आशाओं, संभावनाओं को गुन लूँ, उनके नये-नये, फैलते-पसरते वृत्त-विस्तार-विन्यास को चुन, बुन लूँ, उज्ज्वल संदर्भों से मन को भर दूँ! रात की कहानी रात-सी ही रहेगी, थोड़ा प्रात की कहावतों, मुहावरों को पढ़ लूँ, पकड़-समेट लूँ, गढ़ लूँ!  -सतीश  Ko Olina, Hawaii 26 Dec, 2021. 

अटलजी

उन्होंने राजनीति को कविता की आत्मा दी, और, कविता को सचेतन कर्म-धर्म दिया; यों,  उनके भीतर का राजनीतिकार छोटा नहीं हुआ, और, कविता पलायन में नहीं रही, आशा, क्रिया और धर्म से “निरपेक्ष” नहीं रही! ⁃ सतीश  Dec 25, 2021.  Honolulu, Hawaii. 

पर्ल हार्बर

 संघर्षों, बलिदानों की पुण्य भूमि!   स्वतंत्रता के रक्षकों की तीर्थ-स्थली! बलिदानों के कर्म-आसक्त रक्त से सोये-जगे ज्वालामुखी के मुँह, मन, तेवर, पर्वतों पर लेटे-सुस्ताते पत्थर, मिट्टी के कण-कण अब भी लाल-लाल हैं!  यहाँ  नन्हीं-नन्हीं, सरल-तरल धूप मन पर अविरल छा जाती है, हल्की-हल्की हवाओं की अरोक थापें दूर गत-विगत भावों को उकसाती  हैं। बादल विह्वल होकर  घाटियों पर छा जाते हैं, पर्वतों से गलबाहियाँ करते रहते हैं; आसमान की छाती नम हो जाती है, वर्षा की हल्की-भारी बूँदें आकुल होकर समय-असमय पर पूरी प्रकृति को भिंगो देती हैं। सूरज की तप्त, उज्ज्वल किरणें अपने स्मृति-यात्रा-पथ में प्रकृति के आँसुओं से टकराकर वीरों, वीरगतियों-बलिदानों को याद कर, उनके बिम्ब-प्रतिबिम्बों को सँजो-सँवार कर मनोहारी, प्रसन्न इन्द्रधुनष रचती रहती हैं।  -सतीश  24th Dec, 2021.  Pearl Harbor, Hawaii. 

राष्ट्रीय चेतना

 हमारी राष्ट्रीय चेतना को  सिखाया-बुझाया गया कि  कुछ सत्यों, वास्तविकताओं को नहीं देखना, उन्हें नहीं बताना, उन पर चर्चा नहीं करना, उनके बोध-मर्म को समूल नष्ट करना,  ‘प्रगति’ का आधुनिक ‘शील’ है,  ‘मानवता’ की अगली वृहत् कथा है, ‘अन्तर्राष्ट्रीय’ होने की प्रवृत्ति-मनोवृत्ति, उसकी अन्तरात्मा के तथाकथित  स्वस्थ, विकसित लक्षण हैं, ‘आधुनिकता’ का अमिय पान है!  हमारी चेतना को मनाही है, उन सत्यों के मन को टटोलने की; उनकी संवेदनाओं,  उनके विन्यासों, उनके स्पंदनों, उनकी अभिव्यक्तियों को  पढ़ने-परखने की।  तो, ऐसी चेतना से सचेत रहना, उसे खंगालते, माँजते रहना,  उसे सुलझाते रहना, उसका रचनात्मक, सृजनात्मक अवलोकन करना हमारा राष्ट्रीय कर्त्तव्य है,  हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है, उच्चतम धर्म है, श्रेष्ठतम कला-कर्म-दायित्व भी!  -सतीश  5 Dec, 2021.