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अशफाक के जन्म-दिन पर

स्पष्ट ध्येय से आसक्त अर्पण को, क्या  कहूँ इस एकनिष्ठ समर्पण को? नमन और कृतज्ञता के हर शब्द अशक्त हैं; कुछ और नहीं,  देश-कर्म-धर्म ही है एक लघु तर्पण ! ⁃ सतीश   Oct 23, 2022. 

ऐसा दीया

एक सुयज्ञ की सु-अग्नि के  कर्म-तप से जीवन उजले, अग-जग का सारा तप जले, चेतन-अचेतन सब सुंदर हों, सम्पूर्ण प्रकृति-कृति समवेत रहे, सब चित्त , सब चित्र जगें!  सृजन-धर्म-कर्म के मान-प्राण शिव! दीप-जीवन में ऐसा शक्ति-सूत्र भर दो, उसकी लौ में ऐसा तेज-ताप भर दो, उसकी जलन-तपन में ऐसा तप भर दो कि सब सुबह धवल हों, सब साँझ अमल हों।  शरद-हेमंत-शीत-वसंत, ग्रीष्म-वर्षा -  सब सहास हों, पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण  सब युक्त-संयुक्त रहें, सब आफत-आतप-आपदा हटे, भारत-भू पर अमृत बरसे, सारा जग हो उत्फुल्ल, उठे, देश-प्रदेश-विदेश उजले !  ऐसा दीया अपने मन में रख दो, ऐसा दीया जन-मन में धर दो, ऐसा दीया जन-गण में भर दो!  ⁃ सतीश  April 5, 2020. 

सबसे बड़ी परीक्षा

व्यंग्य के तीर फेंकना आसान है, हास्य का पुट जगा देना आसान है, तर्क के तुरूप गढ़ना आसान है, कला की तीक्ष्ण छैनी चलाना आसान है,  कविता या कहानी लिख देना  फिर भी आसान है; पर, जीवन में कर्म की धरा पर पाँव रखना, कुछ डग भरना, कर्त्तव्यों के संभावित संदर्भों को तरीक़े-से पढ़ पाना, उनसे जुड़े तथ्यों को सही-सही परखना,  और तब कुछ सार्थक, कुछ ऊँचे बने रहना सबसे सुंदर लक्ष्य, सबसे श्रेष्ठ सौग़ात, जीवन, जीवन-क्रिया की सबसे बड़ी परीक्षा है!  ⁃ सतीश  Oct 17, 2022. 

एक सीधी-साधी साँझ

चाय की हल्की चुस्की, और नींद की दो अनजानी घूँट!  इस बीच,  हल्की-सी हवा धीरे-से छू कर चली गई!  उधर, अभी-अभी आयी  सरल, सुंदर, स्पष्ट चाँदनी  अँधेरे को कुछ कहती रही, चुपचाप, लगभग अशब्द!  बहुत सारे अर्थों के बिना, बहुतेरे रव से अलग, एक सीधी-साधी साँझ!  -सतीश  Oct 7, 2022

तर्क और जीवन

जीवन की राहों में  तर्क आवश्यक होते हैं। पर, चारों ओर की आपाधापी में, अच्छा हो, यदि हम  तर्कों को कम, संबंधों को अधिक जिया करें, तर्कों को कम, मन-बंधों को अधिक जिया करें, तर्कों को कम, स्वयं जीवन को अधिक जिया करें!  और, समय-समय पर, तर्कों से थोड़ा दूर हटकर, ज़िद की गाँठों, गुत्थियों को  हम अनवरत खोलते रहें - सोच का नया फलक,  नव अनुभूति-सौंदर्य,  नव जीवन-विन्यास बनाते हुए!  ⁃ सतीश     Oct 7, 2022 

लघु प्रार्थना

माँ दुर्गे, एक लघु प्रार्थना है - तुम हमें ऐसा आशीष दो कि  विशद पट मन का खुला रहे, सात्विक चेतना की पुनीत अग्नि जलती रहे; अक्षर, शब्द, अभिव्यक्ति की आत्मा  शील, सही और सच से भरी हो; पूजा की हर विधा, हर उपकरण, पूजा की हर सोच, मुद्रा, हर क्षण  अपने आप में पूजा हो जाये!  - सतीश  Oct 1, 2022.  सप्तमी, दुर्गा पूजा।