संदेश

माँ दुर्गा

विशद भाल पर सृष्टि-पटल, भृकुटि पर मर्यादा की गति-मति, नयनों में सजग, समग्र दृष्टि, अधरों में अनंत जीवन-रेख धरे,  माँ, तेरे आनन धवल, पुनीत, सकल छविधाम!                हे सभ्यतामानिनी, संस्कृतिरक्षिणी,        विघ्ननाशिनी,  शक्तिधारिणी,        माँ, तुझको है बार-बार  नमन!  तेरे आशीष से, माँ, जग का संताप दूर हो, चारों ओर तुमुल तम-तोमों,  कलुषों, अंहकारों का मर्दन हो,  ज्ञान-शक्ति बड़े उद्देश्यों से जुड़ कर  सुशक्ति-दीपित, सात्विक बने, विजय की शालीन शैली हर सफलता के लिए अभीष्ट बने!  सकर्मक शब्दों की महती छवि, जीवन, जीवन की सुंदर नियत,  सम्पूर्ण स्वत्व, अस्तित्व  तेरे चरणों पर समर्पित हों !  सब यामों के रग-रग में श्याम बसें, सब अभिरामों में राम रहें!                 हे भव-भाव-तारिणी, माँ भवानी,        तुझको है बार-बार नमन!  - सतीश  April 2, 2022 (चैत्र नवरात्रि)

ये अरि-वृंत

 समय साक्षी है - सत्ताओं को समय-असमय लग जाती है, कानों पर मोटे मफ़लर चढ़ाने की आदत! बहरी होकर वे सही व्यवहार भूल जाती हैं, फिर, अन्यमनस्क, विक्षिप्त हो जाती हैं! उन्हें डर लगता है  सच से ही नहीं, सच के पोस्टरों से भी; प्रजातंत्र की पवित्रतम संस्थाओं में  उनकी राक्षसी हँसी सभ्यता की दिवारों से  टकराती हैं और क्रूर  चुनौती देती है  मान, मर्यादा, व्यवस्था को, मानवता को ! चुनौती! क्योंकि उन्हें भय है कि  सच की विभा उन्हें ढँक देगी, किसी सूरज की ओज भरी किरणें  उन्हें तिरोहित कर देंगी, सजग जनता के समर्थन का प्लावन  उन्हें दूर फेंक देगा -  अनस्तित्व की ओर!  किसी भी काल-क्षेत्र में, किसी भी भूमि-खंड में, ऐसे व्यक्तित्व  सुंदर  “अरविंद” नहीं होते, वे उच्च भावों, सुंदर संवेदनाओं,  सभ्यता-संस्कृति के अराजक अरि,  अरि-वृन्त होते हैं!  संदर्भ  32 वर्षों के सच का हो,  या शताब्दियों के सत्त्व का, भूल जाती हैं कुंठित सत्ताएँ कि इतिहास की क्रूर आहटों में  वे निर्मम रूप से भूला दी जाती हैं; चाहे-अनचाहे,  यह...

कला-अभिव्यक्ति (2)(TheKashmirFiles) !

The Kashmir Files के विरूद्ध  अनियंत्रित आलोचनाएँ आयीं, अराजक आरोप आये; नकारी शक्तियों के अचूक प्रहार,  तथाकथित उच्च शिखरों की चुप्पी,  बहिष्कारों, दुष्प्रचारों के साथ-साथ  तरह-तरह के हथकंडे खुल कर सामने आये, भिन्न-भिन्न तरकीबों ने अपने चरित्र दिखाये!  समय के नकारात्मक तत्त्व  पूरी कुंठा के साथ व्यस्त हैं! “प्रेम” के अद्भुत “प्रयोग” में  इन्हें परहेज़ है सत्य के अंश से; “शांति” की “साधना” में  हत्या-हत्यारों, बलात्कारों-चित्कारों से नहीं,  उन्हें घृणा है यथार्थ-अंकन, चित्रण, चित्रांकन से; यही उनका भीतरी पट है, चित्र है, चित्रपट है! The Kashmir Files के  ये विरोधी, विदूषक, वीभत्स अवरोधी  नाहक भूल जाते हैं कि  यह पक्ष नहीं, विपक्ष नहीं, एक भीषण, नग्न सत्य, तथ्य है, हमारी आदि-संस्कृति की सृजन-भूमि में मानवता के संहार का एक सवाक् कथ्य है! अंतत:, न्यायालय ने कुप्रयासों को अस्वीकृत किया, जनता ने अथाह समर्थन दिया, पूरे मन से अभिवादन किया; कश्मीर में हुई मानव-त्रासदी के  अपने अबोध को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया,  अभूतपूर्व रूप...

शांति-युद्ध के जादूगर

एक बात तो फिर लौट कर आयी  कि शांति की बड़ी, सुनहरी पहेलियों के पीछे  बैठे होते हैं, युद्ध के निपुण बाज, कलाबाज़!  ऐसा भी होता है कि शांति के दुभाषिये युद्ध की भाषा गढ़ते हैं, उसका मान्य व्याकरण बनाते हैं! “प्रजातंत्र” और “विश्व-हित” के  सुसंस्कृत कबूतरों की शालीन फड़फड़ाहटों में  सुनाई पड़ती हैं उन्मादी युद्ध की भयानक आहटें!  और, मोहक, गोरी अवधारणों में, आकलनों-विवरणों-विश्लेषणों में व्यस्त हो जाते हैं, जग-स्वतंत्रता के विशद स्तम्भ! औरों की जीवन-बलि से, अन्यों के कंधों पर टिकी चिताओं पर  सजती हैं विश्व-नायकों की बेतरतीब कुंठाएँ; दूसरों के रक्त से सन कर गाढ़ी होती हैं, विश्व-पुरोधाओं, प्रणेताओं की असीमित आसक्तियाँ!  ठगी वही नहीं जो  इतिहास-भूगोल की चौहद्दी को नकारती है, बल्कि, वह भी है जो शांति के सूत्रों, शास्त्रों, संगीतों के साथ  तरह-तरह के आश्वासन बुन कर, विश्वास के बेडौल कवच ओढ़ाकर, घृणित स्वार्थों, लहुलूहान सत्ता-समीकरणों के लिए हमको और आपको, मित्रों-सहयोगियों को  युद्ध-ज्वाला में धकेल देती है; और, स्वयं निश्चिंत बनी रहती है, अ...

भारत की जनता!

 अनंत छायाओं से छली हुई, असंख्य स्वप्नों में भुलायी हुई, बार-बार के वादों से ठगी हुई, जाति-धर्म की गोटी-बोटी पर, सत्ता के ओछे समीकरणों से परस्त, निरस्त, अस्त  भारत की जनता! छोटी-छोटी आकांक्षाओं के पूरे नहीं होने से व्यथित, प्रजातंत्र की साकार माया-ममता,  मुफ़्त बिजली-पानी के ठेकेदारों,  हड़तालों-आंदोलनों के व्याकुल खिलाड़ी, खाये-पिये-अघाये, निरर्थक बादलों से, आतंक के देशी-विदेशी, अभेद्य जालों से भ्रमित, ग्रसित, मान-मर्दित, लुंठित, कुंठित भारत की जनता! अन्ना-आंदोलन के श्वेत विचारधारी, लोकपाल और भ्रष्टाचार के विशेषज्ञ, आप उन्हें कह लें अध्येता या आराधक, सभ्य-शिक्षित, सुसंस्कृत,  तकनीकों के पैंतरों से लैस व्यक्तित्व  देश-विरोधी शक्तियों की गलियों में खो गये?  भ्रष्टाचार के भयानक पंजों में, ऊँचे नायकों की ख़रीद-बिक्री में दबोची हुई,  प्राण तोड़ती व्यवस्था तले कराहती हुई, विकास की अनबुझ  कथाओं-कहावतों में, आँकड़ों, आकलनों, विवरणों, विश्लेषणों की पहेलियों में, भूली, भुलाई हुई भारत की जनता!  ग़रीबों की ग़रीबी के व्यापारी राजनीति में दिन-रात लगा...

आँखों से आँखें मिलीं !

आँखों से आँखें मिलीं, हम सारी बातें भूल गये, भावों के भँवर उठे- बनी उनके छोटे-बड़े वृत्तों की घूर्णियाँ, उनकी आकुल टकराहट, फिर हुआ एक-दूसरे में उनका हर्षित विलय!  पुतली की नोकों पर चढ़े हुए भावों की सुंदर आहट में  यामों-आयामों को हम बिसर गये; सोच-विचार, चिंतन-मनन, जीवन के सारे उच्च मान-दर्शन, किस ओर गये, किस ओर मुड़े? किस ओर चले, किस ओर उड़े? आँखों से आँखें मिलीं, हम सारी बातें भूल गये!  नयनों की गूढ़-तीक्ष्ण कलाओं में जीवन के सब रंग जगे, अनगिनत स्वप्नों के मन बने, उभरे हल्के उघड़े क्षण, छोटे-सहज संवाद, इधर-उधर की यादों के टुकड़े; ये कुछ बहते, कुछ रूक कर कहते! आँखों से आँखें मिलीं, हम सारी बातें भूल गये!  -सतीश  Feb 19, 2022. 

नयी भोर की बारी है!

नयी भोर की बारी है!  प्रकृति ने नया विधान किया, उज्ज्वल सत्व-बोधों का संधान किया, क्षितिज पर मूल्यों को नया मान मिला,  अग-जग को सुंदर परिधान मिला, तिमिर-व्यवस्था से परित्राण मिला!  तम के अनियंत्रित तत्वों, व्यक्तित्वों, अराजकताओं के अंहकारों, आलापों को  अपनी परिसीमा का ज्ञान हुआ। नव रव-रंग, नव राग-लक्ष्य, आशाओं, संभावनाओं, योग, संयोग, प्रयोग से भरी-भरी यह नयी भोर की बारी है!  सतीश  Jan 30, 2022.