संदेश

माँ

हमारी ग़लतियाँ, हमारी भूलें, हमारे नखरे, हमारी चिड़चिड़ाहट, हमारे क्रोध-क्षोभ -  ये सब तुम्हारे जीवन-भूगोल के ऊँचे-नीचे टीले हो गये, तुम्हारे जीवन के क्रीड़ा-कलाप हो गये, तुम्हारे जीवन-यज्ञ के राग-जाप हो गये!  माँ, तुम प्रकृति की सबसे सुंदर,                            सबसे सहज,                            सबसे सकर्मक,                            सबसे सुज्वलंत आहुति हो!  तुम्हारे कर्म की बाँहें जीवन-धरती और जीवन-आकाश को आपस में जोड़ती  क्षितिज-रेखा है, तुम्हारी कर्म-चेतना हर रोज़  ओस की बूँदें बनकर टपकती हैं, तुम भोर के शरीर में  अपनी धमनियों के रक्त-रेशे, रक्त-राग देती हो, दोपहरी को  अपने कर्म-ताप की तपतपाहट देती हो, तुम शाम के सूर्य को  मर्यादा से लाल कर देती हो, अपनी प्रकृति-प्रवृत्ति से उसे  स्निग्ध, रमणीय-दर्शनीय बना देती हो!  मा...

एक विचित्र चित्र

एक विचित्र चित्र है?  न जाने कैसी अनूठी लत है?  जिन-जिन चेहरों, चरित्रों पर हमने प्रश्न उठाये, जिन-जिन “नेह-रूहों” वाली प्रवृत्तियों पर हमने धावे बोले, वे अचानक हमें बेहद प्यारे हो गये; उनकी छायाओं की अठखेलियों से  हम अभिभूत हो गये!  उनकी तरह हम भी धर्म से “निरपेक्ष” हो गये!  सजग, सचेत, सोद्देश्य, सात्विक होकर? या, अप्सरामयी सुविधाओं वाली  समीकरणों की तीक्ष्ण लीला में?  सचमुच, एक विचित्र चित्र है?  या, घनी चित्रमाला है?  न जाने कैसी अनूठी लत है?  देश की कैसी बेचैन रत है?  -सतीश  23 August, 2022. 

मैं हिंदी

मैं “तुलसी” की राम-कथा, मीरा की मोहन-वंदना बनी,  सूरदास के “कन्हैया” की  अपरिमेय, मोहक गति बनी!  “कबीर” की अनगढ़ जीवन-शैली,  मैं रहीम की अक्षय वाणी बनी,  मैं रसखान की अमोल थाती,  विद्यापति का शिवमय गान बनी!  मैं “भूषण” की वीर-छवि बनी, बिहारी की रीति-कला में सनकर मैं सरस श्रृंगार, आगार बनी।  भारतेंदु की सजग इंदु-ज्योति में  मैनें देखा - “अँधेर नगरी, चौपट राजा, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा”!  फिर, मेरा मन चित्कार उठा - “आवहु भारत भाई, भारत-दुर्दशा न देखी जाई"।  मैं “पंत” का प्राण-परिचय,  प्रकृति का सुकोमल संचय “पल्लव” और “गुंजन” बनी !  प्रकृति के अवयवों को  देख-देख कर मैं गा उठी - “सुंदर है विहग, सुमन सुंदर, मानव तुम सबसे सुंदरतम!” महादेवी के गीतों में बसकर  मैनें  भक्ति का अनोखा रूप पहचाना -  “विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना”!  प्रसाद की “कामायनी” बनकर  सारे जग में मैं कह उठी - “तुमुल कोलाहल कलह में मैं ह्रदय की बात रे मन”!  गुप्त की धर्म-चेतना से उठकर  पूरे पुनर्जागरण-भाव ...

भोर से रात तक

  भोर से रात तक   - -  उसने क्षितिज को चूमा, वह निहाल, प्रसन्न हो गई, खिल कर चारों ओर फैल गई, वह स्वयं लाल-लाल हो गई, भोर हो गई!  चतुर्दिक, कलरव, भविष्य के सुंदर रव चहकने लगे, वह सचेतन तप से जल उठी,  उजली हो गई।  वह दिन भर जलती रही, दिन भर उजलती रही!  वह सार, संसार, प्रसार हो गई!  उसने विराम लिया, वह शाम हो गई, अभिराम हो गई, कुछ राम, कुछ श्याम हो गई, राममय, श्याममय हो गई।  कुछ देर बाद, लोगों ने कहा, देखो, वह रात हो गई; सच है, लगा कि  जीवन के भिन्न-भिन्न पहर को पार कर  निरंतर छहर कर, लहर, पसर कर  नैसर्गिक प्रकिया में वह एक गहरी, बड़ी बिसात हो गई!  यों, भोर से रात तक, वह प्रकृति, प्रकृति की कृति, कृति की प्रकृति,  कृति की यात्रा, महायात्रा हो गई- सदेह, विदेह, निर्विष, निर्विकार, सशब्द, नि:शब्द!  - सतीश  Sep 3, 2022. 

जय गणेश

गण को, गणों को, गुण-गणों को नमन ! गणों के ईश को नमन! सगुण-निर्गुण, आगम-निगम, चर-अचर, जर-अजर को  भव-विभव के कल्याण-भावों से  सिक्त, सविनय, समन, हमारा नमन! सहेतु या अहेतु, सहित या रहित भाव से जग के सच्चे उद्देश्यों के प्रति  सजग, सात्विक  होकर  छोटी से छोटी सवारी पर चढ़ कर तुमने माता-पिता को मन में धारे, उनकी धुरी के चारों ओर जीवन का गहन अवगाहन किया, आकलन, अवलोकन, आराधन किया। यों, तुमने हमें स्पष्ट बताया - जीवन के श्रेष्ठ आरोहण के  सुंदर, उच्च, शील और सत्व !  तेरे मुखमंडल पर विराज रहे सृष्टि के दिव्य निरूपण, प्रक्षेपण, जीवन के सरल-सीधे, वक्र चक्र ! ऐ आदि-अनन्त, तुझको नमन! -सतीश 31 August/1st September, 2022

राजनीति से पलायन

 राजनीति से पलायन, एक विशुद्ध ढोंग है, छबीला छल है; हम सबों का, विशेषकर, तथाकथित  पढ़े-लिखे लोगों का एक सजीव पाप है! -  समाज के प्रति, व्यवस्था के प्रति,  देश, देश-कर्म के प्रति,  विश्व और विश्व-बोध के प्रति!  सत्ता के गलियारों में, मुँडेरों, डेरों पर अपराधी, चोर, उचक्के, घोटालेबाज़  यदि उपस्थित हैं, आसीन हैं, तो, इसके लिए हम सभी उत्तरदायी हैं! -  व्यक्ति की भूमिका में, समाज की भूमि पर!  जीवन का कोई क्षेत्र नहीं, कोई अंग नहीं, जिससे होकर राजनीति गुजरती नहीं; फिर, हम इससे ऊपर उठने का छद्म-भाव क्यों पाले रहते हैं? क्यों ओढ़े रहते हैं?  क्यों पलायन को प्रबुद्ध, शुद्ध बताते रहते हैं? अपने आप को विशेष, अशेष जताते रहते हैं?  एक सीमा के बाद, राजनीति से तथाकथित दूरी  हर तर्क, हर बहस को, हर कविता-कहानी-कला को  अघोषित आलाप-विलाप बना देती है, भ्रांत पथ की अंतहीन यात्रा पर भेज देती है!  ⁃ सतीश  22 August, 2022.  1.03 PM.

नव बिहार, नव विहार!

पर्यावरण! जंगल!  जलवायु-परिवर्तन!  वरण की अथक यात्रा?  या हरण का सतेज वरण?  बिहार का उच्च तेजार्थ !  चारा, बेचारा! सामाजिक न्याय की पुनीत गति? सम्पूर्ण क्रांति की पूर्ण कथा-प्रथा!  अनवरत, अप्रतिहत, अरूद्ध !  “सामाजिक न्याय” का सुंदर, स्वस्थ विहार! हार मत कहना इसे, ऐ बिहार, यह किसी के गले का “आरक्षित” हार है! यह प्रजातंत्र की धन्य, मूर्द्धन्य जय है! सुशासन है,  विकास की अदम्य कथा है।  जंगल नहीं यह,  जन, जन-हित के गलित-विगलित, द्रवित होने की, होते रहने  की  नैसर्गिक प्रकृति है!  मौसम की बदल है, भरे सावन में गुर्राते बादलों की  चतुर अदला-बदली का मनोहारी खेल है! अर्थ के अर्थों से सनी-सनी  एक आवश्यक, अबाध्य क्रिया है?  रास-लास की लीला है?  जलवायु-परिवर्तन!  प्रजातंत्र के जल और वायु को  नयी वर्तनी मिल गई है!  क्षितिज और पावक भी किसी पुनीत यज्ञ-भाव से धवल हो उठे हैं!  याद रखनी चाहिए तुम्हें कि लोग कहते हैं,  यह “विकास”, “विकास-पुरूष” की  ऊँची आशाओं के सुंदर, “हसीन” स्वप्नों की...