संदेश

विक्रम और प्रज्ञान

देखो   न ,  भारत   का  “ विक्रम   और   प्रज्ञान ” आज   चाँद   पर   उतर   गया  !  शून्य   को   साधता   हुआ   भारत   का   आत्म - विश्वास   चाँद   के   व्यक्तित्व   को   छू   गया !  यह   है   भारत ,  उसके   विज्ञान ,  वैज्ञानिकों   के नये   विक्रम ,  नये   प्रज्ञान   का   नया   धवल   क्षितिज ,  उनकी     योग - साधना   की   महती   उपलब्धि ,  प्रकृति - सृष्टि   के   विशद   आशीष   की   शुभ   वेला , संस्कृति   के   राममय   तुलसी ,  तुलसी - बोध   की   जन्मजयंती !  सतीश   August 23, 2023 जन्मजयंती, तुलसीदास जी 

संदेश

पता   नहीं , “ संदेश ”  में  “ देश ”  क्यों   बैठा   है ?  कुछ   ज्ञात   नहीं   मुझे ,  कोई   विशेष   बोध   नहीं , पर ,  मन - ही - मन ,  इस   शब्द   की   बुनावट और   भंगिमा   आश्चर्य   में   डाल   देती   है ,  फिर ,  कहीं   दूर   ले   जाती   है ,  यों   ही !  - सतीश   August 11, 2023. 

सर्प-कला !

सर्प-कला!  हम बड़ी-बड़ी “शिक्षा” लेकर, ऊँचे “सभ्य”, “सुसंस्कृत” होकर विष, विष-निवेश, विष-विनिमय  में पूरी साधना से लीन-तल्लीन-विलीन हैं!  अपने-अपने “फ़न” में माहिर, दंश-कला के निष्ठावान साधक, पद, पैसा, और पहुँच के खेल के विशेषज्ञ, समाज के उज्ज्वल मणि, मोती-मरकत  निरंतर सम्पूर्ण मन से सर्प बने हैं, विभिन्न भंगिमाओं, मुद्राओं में मग्न  सतत् सर्प बनने में तुले हैं,   बेहिचक अड़े हैं!  -सतीश  August 21, 2023 नागपंचमी, सावन। 

जीवन में जीवन रहे

जीवन   में   जीवन   रहे ,  सशरीर   रहे , यह   जीवन   की   पहली   आवश्यकता   है !  सफलता - असफलता ,  सुख - दु : ख , क्रोध - अक्रोध ,  प्रेम - घृणा ,  तृष्णा - वितृष्णा  - ये   जीवन   की   आती - जाती   मेड़ें   हैं , छोटे - बड़े   पद - चिन्ह ,  मान्य - अमान्य   पायदान   हैं !  ये   अलग - अलग   या   मिल - जुल   कर   भी   स्वयं   जीवन   से   बड़े   नहीं   होते ,  नहीं   हो   सकते !  जीवन   में   जीवन   रहे ,  सशरीर   रहे , यह   जीवन   की   पहली   आवश्यकता   है !  - सतीश   August 21, 2023 

दूर जाती आँखें

सिमटा   हुआ   मन , ठहरी   हुई   यादें , ऊभ - चुभ   सोच !  भाव - भँवर   की   घूर्णियों   में   घूमती   आँखें   जा   रही   हैं   चुपचाप     दूर - सुदूर  - राग - रंग - रव   ढूँढती ,  कुछ   अंतरंग   खोजती , अनुभूतियों   का   पता - ठिकाना   टोहती  - कुछ   पहचानी - सी ,  कुछ   अनजानी - सी !  -  सतीश April 16, 2023 & May 5, 2023

राजनीति और साहित्य

मैं   कभी   नहीं   कहता   कि   राजनीति   छोटी   होती   है ; हाँ ,  बार - बार   कहता   हूँ   कि   साहित्य   की   दृष्टि   बड़ी   होती   है !  और ,  जब - जब   साहित्य - दृष्टि   संक्षिप्त   होती   है , निश्चित   ही ,  भीतर - ही - भीतर ,    कहीं - न - कहीं   वह   अपने   आपसे   से   रहित   होती   है ,  रिक्त   होती   है !  - सतीश   Jan 14, 2023. 

कविता क्या करेगी?

अरे भाई, कविता क्या करेगी?  वह फूलों-पत्तियों-कलियों-पंखुड़ियों से अपने बिम्बों-प्रतिबिंबों को सजाती रहेगी? वह चाँद-चाँदनियों की राग-रंग-रेखाओं से निरन्तर खेलती रहेगी? वह भावमय भोर के आँगन में  प्रेममय अठखेलियाँ करती रहेगी?  या, समय-क्षितिज पर कभी कर्म, कभी कर्म-स्वेद, कभी कर्म-केन्द्र  बनकर उपस्थित रहेगी? अरे भाई, कविता क्या करेगी? वह भीष्म-पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य बनकर धर्म का आलाप करेगी; पर, व्यक्तिगत प्रतिज्ञाओं से बँधकर  अधर्म की रक्षा में युद्ध करेगी?  या, विदुर बनकर सत्धर्म की सलाह पेश कर  संन्यास ढूँढने चली जायेगी? या, शंका बनकर अर्जुन को कोसेगी? या, अर्जुन के गांडीव की गति-मति बनेगी?  या, श्रीकृष्ण बनकर प्रतिज्ञाओं के मान-मानदंडों की नई भाषा-परिभाषा रचेगी? और, सुदर्शन-चक्र धारण कर नया कर्म-दर्शन गढ़ेगी?  अरे भाई, कविता क्या करेगी? वह दुनिया के रावणों की विद्वता पर मुग्ध होगी? वह तर्कों-तथ्यों-सूचनाओं, बहस-विवरणों-विश्लेषणों  के दाँव-पेंच की भंगिमाओं-मुद्राओं, प्रपंच-प्रलापों में मस्त-व्यस्त रहेगी? या, श्रीराम के कर्म-धनुष ...