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प्रतीक्षा है कला की

प्रतीक्षा   है  कला की - प्रतीक्षा   है , तर्कों ,  विचारों ,  भावों     के   शिविर   में   बेवजह   उलझने   की   नहीं , बल्कि ,  सुलझने   की   कला   हो ; दोष   और   दूषण   के   आरोपण   से   दूर , कुंठा   और   अकर्म   की   मानसिकता   से   परे योग्यता - पटल   गढ़ने   की   कला   हो , कर्म - पुट   रचने   की   कला   हो ; देश   से   मनोदेश   तक   अपने   भीतर   धँसने   की , स्वयं   को   अनवरत   ढूँढने   की   कला   हो , सतत्   मार्जन ,  परिवर्द्धन   की   कला   हो।   प्रतीक्षा   है !  - सतीश   May 23, 2023. 

माँ गंगा

माँ   गंगा   तुम   तुंग   शिखर   से   धरती   पर   आयी हमें   जीवन   देने   के   लिए , तुमने   अपने   अभिमान   को   धरातल   पर   लिटा   दिया , हमारे   पालन - पोषण   के   लिए , तुम   सहजता   से   बह   गयी , सृष्टि   को   संजीवनी   तरलता   देने   के   लिए , तुम   महासमुद्र   में   सशरीर ,  समन   विलीन   हुई , हमारे   जीवन   में   लीन - तल्लीन   होने   के   लिए !  माँ - सी ! - सतीश   May 29, 2023.  गंगा - दशहरा  

शस्य

शस्य   धरती   के   भीतर   चाहे   जितना   भी   अँधेरा   हो , वह   सुंदर   शस्य   उगा   देने   से   रूकती   नहीं ,  थमती   नहीं !  धरा   का   नैसर्गिक   स्व ,  स्वत्व , प्रकृति   का   हँसमुख   हरित   सत्व   कोमल   भावों   से   हर्षित   होकर , उत्सुकता   से   प्राणित   होकर ,  तन्मयता   से   हिल - डुल   कर मन   के   ऊपर   हल्के   से   उभर   आता ! सतीश April 14, 2023. 

स्मृति-वल्लरी

स्मृति-वल्लरी    - मन   से   लिपटी   स्मृतियों   की   हरी - भरी   वल्लरी !  कोमल ,  विह्वल - विभोर ,  अलसित ,  निमग्न ,  निर्विकार !  चुपचाप   सहारा   ढूँढती ,  साथ   ही   सार्थक   सहारा   बनती , जीवन - प्रकृति   को   निष्कलुष   सजाती - सँवारती , निरंतर   अनंत   भावों   को   सहास   उकसाती  !  मन   से   लिपटी , री  स्मृति- वल्लरी  !  - सतीश   May 24, 2023. 

फूल और काँटे

फूल   और   काँटे - है   एक   महान्   संयोग   या   प्रकृति   का   अनोखा   योग   कि काँटे   तबीयत   से   नुकीले ,  सिमटे   हुए   होते   हैं और   फूल   मन   से   खिले ,  फैले   होते   हैं ,  खुले   फलक   को   सहर्ष   धारे   रहते   हैं !  कलियों   के   बंध   भी   खुल   कर   खिलखिलाने   को   आकुल   रहते   हैं !  सचमुच ,  एक   संयोग   या   अन्तर्निहित   व्यापक   योग ?  - सतीश   मार्च  19, 2023. 

नींद

नींद   - सच   कहूँ ,  नींद   का   ब्योरा   कैसे   दूँ ?  उसका   विस्तार   कैसे   बताऊँ ?  उसका   विन्यास   कैसे   रखूँ  ? उसकी   जकड़   कैसे   जताऊँ ?  नींद     है -  व्यवस्थाओं   की   चिर   परिचित ,  पुरातन   लत , सभ्यता   के   मठाधीशों   की   विकृत   आसक्ति ; मनुष्य   बनने   से   हमारी   हिचक ,  अपने   ही   भीतर   कुछ   उठ   जाने   के   विरूद्ध   अनवरत   रोक - टोक   की   हमारी   आदत ! सतीश   March 16, 2023. 

नमन

नमन - जीवन   के   रथ   में   एक   यत्न , किरणों   के   पथ   में   एक   नमन , सच्चे   भावों   से   सजल - सिक्त   गहरी   निष्ठा   का   खुला   रत्न समर्पित   तुमको ,  हे   देव ,  समन  !  - सतीश   April 2, 2023.