संदेश

भगत सिंह जी

भगत सिंह जी  तेरे बलिदान की भाषा में देश, जीवन और कला को  समर्पण के नव गीत-संगीत, नये संजीवन शृंगार मिले!  राष्ट्र-यज्ञ में तेरी ज्वलंत आहुति से  भारत माँ को नया अभिसार मिला, उसके चरणों को नई छाप, नई पहचान मिली, उसके मन का उद्वेलन पाप नहीं, पुण्य हो गया;  भावनाओं से तप्त होना तब अपराध नहीं रहा, वह युग-युगों के पार जाता पुनीत बोध बन गया; देश के मन-मिज़ाज को तेरे रक्त से आसक्त भंगिमा मिली, स्वतंत्रता के क्षितिज पर राष्ट्र-ह्रदय की धड़कनों को, जीवन के मर्म-कर्म की परत-परत को,  नई हूक, नया स्वत्व, नया रागत्व मिला!  -सतीश  मार्च 23, 2024.  (शहीद-दिवस के अवसर पर)

एक जीवन-खंड, एक जीवन !

 एक जीवन-खंड, एक जीवन ! उन आँखों के घुमाव की अल्हड़ फुर्ती, ओठों पर मुस्कुराहट की छोटी सी आहट, फिर, एक खुली, खिली, चौड़ी हँसी!  सुंदर भौंहों की प्रसन्न उठान, चहकते हुए उनका वक्र होना,  सुमधुर भावनाओं के भार से आनंद-सिक्त होकर  थोड़ा नीचे आ जाना, स्मृतियों के आर-पार जाती  प्राणवती पुतलियों की सतेज धार; काजल के सजल भावों की उज्ज्वल भंगिमा!  गालों की हड्डियों पर सौन्दर्य के टीले का अलमस्त चढ़ाव! तबियत से खुली, उद्विग्नता-रहित पीठ को थपथपाती, उत्साह-उमंग और विश्वास से भरती, रह-रह कर फहरती, छहरती केशमाला !  धरती के गुरुत्व से परे  मन के बीचोंबीच लयपूर्ण वलय बनाती, अपनी आकर्षण-परिधि गढ़ती, समय-शरीर को ह्रदय की उष्णता देती  संक्षिप्त क्षणों की एक विस्तृत अनुभूति ! - यह है एक जीवन-खंड, या कि एक सकल जीवन!  ⁃ सतीश  14 जनवरी, 2024

ओस

ओस  -  पूरब का क्षितिज  नये-नये स्वप्न से जागृत ! हर्ष-तरंगों से भरी भोर के लाल-लाल कपोल ! आसमान की नीली-नीली, स्वच्छ, पावन भावनाओं की टोह लेती फुदकते खगों की टोली!  इधर, फूलों—पत्तियों पर सहर्ष लेटी ओस की बूँदें!  मन बुदबुदाने लगा कि  ये ओस की बूँदें क्या हैं?  रात-भर नकारात्मक शक्तियों से जूझती  प्रकृति का कर्म-स्वेद?  सुबह को कर्मपरक रहने हेतु मिला आकाश का आशीष-जल?  भोर को भेंट में मिली  रात के ह्रदय की सुंदर भावनाओं की नमी?                 ओस की बूँदों का वलय,         है कर्म-चेतना का मनभावन संचय!  ओस-कण के केंद्र में है उसकी नियत की स्वच्छता! उसकी परिधि पर आसीन है, कर्म-तल्लीन कामनाओं की पारदर्शिता! ओस की तरलता फूलों में समाती, उन्हें शक्ति-प्रेरणा, सजलता देती ताकि दिन की तपतपाहट को झेल-झेल कर भी फूल अपनी सौंदर्य-सुरभि को बनाये रखें !  प्रकृति की कर्मठता के श्रम-विंदु, ये ओस की बूँदें!  -सतीश  28 Nov, 2020

मानचित्र

मानचित्र  - जीवन का मानचित्र कैसा हो?  सजा-धजा, सुघड़, सुडौल,  या कुछ अल्हड़, अनगढ़, कुछ बेडौल?  और मानचित्र की भंगिमा कैसी हो?  जो भूलों-भटकनों की गिनती नहीं करती, स्वप्नों के बनने-बिगड़ने के आँकड़े नहीं रखती, राहों के ऊबड़-खाबड़ होने की चिंता नहीं करती; जो कभी अन्यमनस्क होती, कुछ अनबुझ होती, कभी कुछ खोयी होती, कुछ अनदिख होती, या फिर कभी स्पष्ट प्राप्ति सी प्रत्यक्ष होती!  मानचित्र की भाव-दशा कैसी हो?  अनागत संभावनाओं की प्रथाओं, कथाओं से भरी, ठेसों, ठोकरों, चोटों, कचोटों से प्रेरित होती, प्रहारों, हारों से उमगती, उत्सुक, उत्फुल्ल होती!  मानचित्र की मर्म-भावना कैसी हो?  जीवन की अनपढ़ रेखाओं को उकेरती कला सी, बार-बार अपने को ढूँढती जिज्ञासा सी, अनवरत स्वयं से उलझती पहेली सी, असंतुलन से जन्म लेती अनमोल जीवन-निधि सी,  अपनी सीमाओं को कर्म-धर्म के अनहद नाद से भरती हर विस्तार को चुनौती देती चौहद्दी सी!  जीवन का मानचित्र कैसा हो?  मानचित्र की भंगिमा कैसी हो?  उसकी भाव-दशा, मर्म-भावना कैसी हो?  -सतीश  मार्च 9, 2024.

रंगमंच

रंगमंच   - - नायक ,  महानायक ,  खलनायक   अपनी - अपनी   भूमिका   में   अति   व्यस्त   हैं ; किराये   के   खिलाड़ियों   से   भरी   सभा   है ,  लेखक ,  पत्रकार ,  साहित्यकार   आँखों   की   पुतली ,  तन्मय   कठपुतली   बनने   में   तुले   हैं ,  विशेषज्ञ ,  सर्वज्ञ   अपनी   अदाओं   में   मत्त ,  मस्त   हैं ; भिन्न - भिन्न   भंगिमाओं   के   बीच   तालियाँ ,  अठखेलियाँ   जारी   हैं ,  हँसती ,  खेलती ,  खिलखिलाती   चेतनाओं   के   हार्दिक   जमघट   में   न्याय ,  पत्र ,  पुरस्कार   आयोजित   हैं ,  प्रायोजित   हैं !  बेचारी   जनता   के   पास न   कोई   रंग ,  न   मंच   है , यही   उसका   जीवन , उसके   जीवन   का   अनोखा   रंगमंच   है !  सत...

एक सभ्यता, एक यात्रा

एक   सभ्यता ,  एक   यात्रा   कुछ   चेहरे   हम   पाते   रहे , कुछ   चेहरे   हम   पहनते   रहे ! एक   पूरा   युग   बीत   गया ; जाने - अनजाने ,  देखे - अनदेखे हमारे   चेहरे   पर   असंख्य   चेहरे   जमते   रहे !  चेहरे   पर   चेहरे   चढ़ते   रहे !! लोगों   ने   कहा  -  यह   सभ्यता   है , कुछ   लोगों   ने   बताया  -  यह   यात्रा   है !  — सतीश   28  दिसम्बर , 2023. 

जय श्रीराम !

“जय श्रीराम !” चारों ओर राम, राम की धुन है, राम, राम है मति!  राम, राम ही गुण है, राम, राम है गति!  चाहे पूरब हो, चाहे पश्चिम, चाहे उत्तर हो, चाहे दक्षिण, राम हैं देश के कण-कण में बसे, राम हैं देश के मन-मन में लसे!  राम सभ्यता की पूर्ण मर्यादा और संस्कृति की सकल चेतना!  राम हैं सशरीर परम अनुभूति, और हैं वे सम्पूर्ण संज्ञा ! हर आरती में, हर अर्घ्य में, हर आस में, हर साँस में,  हर पूजा में, हर अर्पण में हे देव, बसी है तेरी प्राण-प्रतिष्ठा,  रमा है तेरा अविरल अभिनंदन!  अयोध्या उल्लसित है चरम ज्योति से, पूरा राष्ट्र है अपूर्व आनंद में निमग्न!  तेरे चरणों पर अर्पित हैं सब जय और पराजय, सब ज्ञान और सब भक्ति, हर कर्म-धर्म, शुद्ध-अशुद्ध युक्ति!  तेरे आशीष हेतु व्यग्र हैं जीवन के सारे संशय, बड़े या छोटे आशय!  युग-युगों से प्रवाहित,  युग-युगों से संचित,  युग-युगों से संकलित नमन  हे देव, तुमको सदैव अर्पित है अनाहत, अनवरत, विनम्र, समन!  -सतीश  21 जनवरी, 2024 श्रीराम-मंदिर में प्रभु की प्राण-प्रतिष्ठा के पूर्व