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पैसा और कविता

पैसा और कविता  जुटा रहता हूँ दिन भर पैसे की कमाई में, जोड़-तोड़ में, शोर-होड़ में, इसलिए कि शाम में एक कविता पढ़ सकूँ, एक कविता सुन सकूँ,  एक कविता गुन सकूँ, एक कविता लिख सकूँ!  ⁃ सतीश  जनवरी 18, 2024. 

चुप्पी का अँधेरापन

चुप्पी का अँधेरापन  कई  बार,  घुप्प अँधेरा चुप होता है;  बहुत बार, सघन अँधेरापन बसा होता है, छोटी-बड़ी चुप्पी में !  ⁃ सतीश  जनवरी 16, 2025 

ऐ हिम, तुम मानव हो क्या?

ऐ हिम, तुम मानव हो क्या?  ऐ हिम, तुम अति श्वेत हो, शालीन, धवल हो, पर, इतने शीत हो !  सच पूछूँ, तुम मानव हो क्या?  तुम हल्की पत्तियों से झरते हो, कोमल बोधों से बरस जाते हो,  फिर, चट्टान से जम जाते हो,  कठिन, कठोर हो जाते हो, तुम मानव हो क्या?  तुम धरा पर लेटे रहते हो, पेड़ों पर बस जाते हो, छज्जों पर छा जाते हो, पर्वतों पर चढ़ जाते हो, अनुद्विग्न फैल जाते हो,  तुम मानव हो क्या?  ऊष्मा को पाकर तुम तरल हो जाते हो, पानी-पानी हो जाते हो, मन, बेमन बह जाते हो!  तुम मानव हो क्या?  शिलाओं से तेरे व्यक्तित्व पर यहाँ-वहाँ कुछ दाग पड़ जाते हैं, कुछ चिन्ह उग आते हैं, आने-जाने वाली कुछ प्रवृत्तियों के पग  अनायास फिसल जाते हैं,  सच बोलो न, तुम मानव हो क्या?  -सतीश  जनवरी 11, 2025. 

वो शांतमना रात !

वो शांतमना रात !  ये रात क्यों सर्द हुई?  नाहक ही यों बेदर्द हुई !  वो अनमनी, बेफ़िक्र, सयानी हो गई, कुछ तीक्ष्ण, कुछ तल्ख़ हो गई!  या, यों कहूँ कि  अग-जग की गहरी, ठहरी पीड़ा,  उसके सर्द रोर-शोर,  तुमुल रव को पी-पीकर  शांतमना रात स्वयं स्याह होती गई, अनजाने ही गहरी काली हो गई!  क्या उसकी पीड़ा से विभोर होकर प्रकृति भोर को ले आती है?  संसार को नई गूँज सौंप देती है,  नव रंग, नई लालिमा, नई भेंट दे देती है!  फिर, लोग कह उठते हैं, -  नवगीत मिला, नव गात, नव गान मिला!  प्रकृति का नया अवदान मिला !  ⁃ सतीश  दिसम्बर 6, 2025

चुप्पी

चुप्पी  अब तक सोचता आया  कि बोलना एक कला है; पर, जीवन के भिन्न-भिन्न पड़ावों पर महसूस करता हूँ कि चुप रहना उससे बड़ी कला है! चुप्पी कभी रूकती है क्या?  कुछ कहती ही रहती है निरंतर वह!  - सतीश  Jan 30, 2023.  & Feb 25, 2023 

बोल निर्झर, बोल

बोल निर्झर, बोल  बोल निर्झर, बोल, तुम क्यों यों बह जाते हो? पर्वत के अन्यमनस्क मन में छाने को, अटपटे ऊँचे शिखर से उतावले होकर  नीचे धरती पर उतरने को,  पत्थरों को भीगाने को, उनके सोये-खोये ह्रदय को झकझोर देने को, राहों में बेफ़िक्री से तने हुए छोटे-बड़े पौधों को कलकल-छलछल भावों  से भर कर ढाढ़स देने को,  सजलता से उत्फुल्ल कर देने को,   घाटियों की धमनियों को छू कर  स्वयं तरल हो जाने को, उनकी मोड़ों की मनभावन करवटों पर फिसल-फिसल कर बढ़ जाने को,  बीहड़ वन की नीरवता को जीवन का रोर-शोर देने को तुम यों छहर जाते हो?  तुम यों फहर जाते हो ?  बोल निर्झर, बोल, तुम क्यों यों बह जाते हो? मूकता भी बोलती है, सच कहूँ ,बहुत बार वो वाचाल होती!  सौंदर्य तेरा मूक या वाचाल है?  बोल निर्झर, बोल, तुम क्यों यों बह जाते हो?  ⁃ सतीश  नबम्बर 16/नबम्बर 26 2024. 

कुछ-कुछ

कुछ-कुछ (मन की उष्मा लिए) “तरल स्मृतियों  के बुलबुले सघन से हो गये हैं, भावनाओं की परिधियाँ पास-पास पड़ी हैं!  फेनिल यादें परत-दर-परत अन्यमनस्क लेटी हैं!  मन की उष्मा लिये चाय सी!” ( तप्त पेय सी) - सतीश मार्च 11, 2024.  कुछ-कुछ (अटकी कलम)  कलम कुछ अटकी-अटकी सी है बेचैन हवा में साँस लेती सी, उँगलियों के बीच   यादों में चुपके ठहरी सी !  वह काग़ज़ पर टिकना भूल गई, मन का ठिकाना ढूँढते-ढूँढते!  कहीं रम कर वह बिसर गई  भावों को कहते-कहते!  - सतीश मार्च 15, 2024