ऐ हिम, तुम मानव हो क्या? ऐ हिम, तुम अति श्वेत हो, शालीन, धवल हो, पर, इतने शीत हो ! सच पूछूँ, तुम मानव हो क्या? तुम हल्की पत्तियों से झरते हो, कोमल बोधों से बरस जाते हो, फिर, चट्टान से जम जाते हो, कठिन, कठोर हो जाते हो, तुम मानव हो क्या? तुम धरा पर लेटे रहते हो, पेड़ों पर बस जाते हो, छज्जों पर छा जाते हो, पर्वतों पर चढ़ जाते हो, अनुद्विग्न फैल जाते हो, तुम मानव हो क्या? ऊष्मा को पाकर तुम तरल हो जाते हो, पानी-पानी हो जाते हो, मन, बेमन बह जाते हो! तुम मानव हो क्या? शिलाओं से तेरे व्यक्तित्व पर यहाँ-वहाँ कुछ दाग पड़ जाते हैं, कुछ चिन्ह उग आते हैं, आने-जाने वाली कुछ प्रवृत्तियों के पग अनायास फिसल जाते हैं, सच बोलो न, तुम मानव हो क्या? -सतीश जनवरी 11, 2025.