भारत की जनता!
अनंत छायाओं से छली हुई, असंख्य स्वप्नों में भुलायी हुई, बार-बार के वादों से ठगी हुई, जाति-धर्म की गोटी-बोटी पर, सत्ता के ओछे समीकरणों से परस्त, निरस्त, अस्त भारत की जनता! छोटी-छोटी आकांक्षाओं के पूरे नहीं होने से व्यथित, प्रजातंत्र की साकार माया-ममता, मुफ़्त बिजली-पानी के ठेकेदारों, हड़तालों-आंदोलनों के व्याकुल खिलाड़ी, खाये-पिये-अघाये, निरर्थक बादलों से, आतंक के देशी-विदेशी, अभेद्य जालों से भ्रमित, ग्रसित, मान-मर्दित, लुंठित, कुंठित भारत की जनता! अन्ना-आंदोलन के श्वेत विचारधारी, लोकपाल और भ्रष्टाचार के विशेषज्ञ, आप उन्हें कह लें अध्येता या आराधक, सभ्य-शिक्षित, सुसंस्कृत, तकनीकों के पैंतरों से लैस व्यक्तित्व देश-विरोधी शक्तियों की गलियों में खो गये? भ्रष्टाचार के भयानक पंजों में, ऊँचे नायकों की ख़रीद-बिक्री में दबोची हुई, प्राण तोड़ती व्यवस्था तले कराहती हुई, विकास की अनबुझ कथाओं-कहावतों में, आँकड़ों, आकलनों, विवरणों, विश्लेषणों की पहेलियों में, भूली, भुलाई हुई भारत की जनता! ग़रीबों की ग़रीबी के व्यापारी राजनीति में दिन-रात लगा...