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भारत की जनता!

 अनंत छायाओं से छली हुई, असंख्य स्वप्नों में भुलायी हुई, बार-बार के वादों से ठगी हुई, जाति-धर्म की गोटी-बोटी पर, सत्ता के ओछे समीकरणों से परस्त, निरस्त, अस्त  भारत की जनता! छोटी-छोटी आकांक्षाओं के पूरे नहीं होने से व्यथित, प्रजातंत्र की साकार माया-ममता,  मुफ़्त बिजली-पानी के ठेकेदारों,  हड़तालों-आंदोलनों के व्याकुल खिलाड़ी, खाये-पिये-अघाये, निरर्थक बादलों से, आतंक के देशी-विदेशी, अभेद्य जालों से भ्रमित, ग्रसित, मान-मर्दित, लुंठित, कुंठित भारत की जनता! अन्ना-आंदोलन के श्वेत विचारधारी, लोकपाल और भ्रष्टाचार के विशेषज्ञ, आप उन्हें कह लें अध्येता या आराधक, सभ्य-शिक्षित, सुसंस्कृत,  तकनीकों के पैंतरों से लैस व्यक्तित्व  देश-विरोधी शक्तियों की गलियों में खो गये?  भ्रष्टाचार के भयानक पंजों में, ऊँचे नायकों की ख़रीद-बिक्री में दबोची हुई,  प्राण तोड़ती व्यवस्था तले कराहती हुई, विकास की अनबुझ  कथाओं-कहावतों में, आँकड़ों, आकलनों, विवरणों, विश्लेषणों की पहेलियों में, भूली, भुलाई हुई भारत की जनता!  ग़रीबों की ग़रीबी के व्यापारी राजनीति में दिन-रात लगा...

आँखों से आँखें मिलीं !

आँखों से आँखें मिलीं, हम सारी बातें भूल गये, भावों के भँवर उठे- बनी उनके छोटे-बड़े वृत्तों की घूर्णियाँ, उनकी आकुल टकराहट, फिर हुआ एक-दूसरे में उनका हर्षित विलय!  पुतली की नोकों पर चढ़े हुए भावों की सुंदर आहट में  यामों-आयामों को हम बिसर गये; सोच-विचार, चिंतन-मनन, जीवन के सारे उच्च मान-दर्शन, किस ओर गये, किस ओर मुड़े? किस ओर चले, किस ओर उड़े? आँखों से आँखें मिलीं, हम सारी बातें भूल गये!  नयनों की गूढ़-तीक्ष्ण कलाओं में जीवन के सब रंग जगे, अनगिनत स्वप्नों के मन बने, उभरे हल्के उघड़े क्षण, छोटे-सहज संवाद, इधर-उधर की यादों के टुकड़े; ये कुछ बहते, कुछ रूक कर कहते! आँखों से आँखें मिलीं, हम सारी बातें भूल गये!  -सतीश  Feb 19, 2022. 

नयी भोर की बारी है!

नयी भोर की बारी है!  प्रकृति ने नया विधान किया, उज्ज्वल सत्व-बोधों का संधान किया, क्षितिज पर मूल्यों को नया मान मिला,  अग-जग को सुंदर परिधान मिला, तिमिर-व्यवस्था से परित्राण मिला!  तम के अनियंत्रित तत्वों, व्यक्तित्वों, अराजकताओं के अंहकारों, आलापों को  अपनी परिसीमा का ज्ञान हुआ। नव रव-रंग, नव राग-लक्ष्य, आशाओं, संभावनाओं, योग, संयोग, प्रयोग से भरी-भरी यह नयी भोर की बारी है!  सतीश  Jan 30, 2022. 

लताजी की महायात्रा !

सरस्वती-पुत्री की महायात्रा!  सुर की पूजा करते-करते, गायन-वादन में बस कर! स्वयं सरस्वती की प्रतिमूर्ति वह, सुरधाम, सुरलोक, स्वयं सुर-साधना वह!  स्वर-महानिधि ने खो दी एक तपस्या, परम कला-ज्योति कहीं चली गयी, नई राग-चेतना में लीन हुई!  -सतीश  Feb 6, 2022. 

जीवन के घने तार

जीवन के गहरे नाते-रिश्ते, संगी-साथी, संबंध-सम्पर्क, भावों के सुघड़ छंद-बंध,  हल्की चोटों में बिखर गये, न जाने कितनी दूर, हल्की ठेसों में लुढ़क गये!  कुछ ज़िद्द, कुछ अफ़रा-तफ़री में,  कुछ आपाधापी, अनजानी मनमानी में, बहुत बार केवल नादानी में, कुछ तर्कों, कुछ बातों में अटक-लटक, अड़-पड़ कर जीवन के घने बुने-बने तार यों ही बेचारे, बेतरतीब हुए, यों ही अनमने कहीं छूट गये।  ⁃ सतीश  Feb 5, 2022. 

लाल-लाल पंखुड़ियाँ!

लाल-लाल पंखुड़ियाँ, सुंदर, सुरभित पीत पराग! जीवन में चारों ओर!  इनके सौंदर्य-वसंत की आभा में अवसादों के तार टूटे, फिर, बातों से कुछ बातें हुईं; इनके मन में बैठ-पैठ कर, मुझको अपनी व्यथा व्यर्थ लगी!  रक्त की भाषा-संहिता जाग उठी, भावों को सुंदर विस्तार मिला, सौन्दर्य-समाधि में लीन-विलीन साँसों ने सुवासित गति पायी!  जीवन के मूल, अमूल्य मन-प्राण!  लाल-लाल पंखुड़ियाँ, सुंदर, सुरभित पीत पराग! जीवन में चारों ओर!  -सतीश  Feb 5, 2022. 

माँ सरस्वती।

तेरी वीणा की झंकारों से  निनादित होते सृष्टि के  सुंदर स्वप्न, सात्विक कला-विधान, उनके विंदु-विंदु, तार-तार, समग्र सार-प्रसार!  तेरा पुनीत आसन बनकर  कमल का सौभाग्य-सौंदर्य दमकता है, तेरे चरणों की धूलि में हंसों की बारी आती; वे होते मान्य, सुशोभित,  कुछ कहते, कुछ सुन-गुन लेते!  तेरे पगों पर अर्पित हो एक प्रार्थना माँगती है कि जब भी तूलिका उठे, जाने-अनजाने उसकी तूल में  तर्क, विचार, भाव  कभी, कहीं बिके-गिरे नहीं; जीवन के उच्च मान-मूल्य  न भ्रमित हों, न गर्हित हों।  भारत-भूमि, देश-धर्म, देश-मान, देश-कर्म, देश-हेतु ही जग-कर्त्तव्य!  इन भावों से प्राणित, अनुप्राणित होकर  सदा तेरे चरणों पर अर्पित हों,  हर अक्षर, हर शब्द-पंक्ति-कर्म, आस - प्रयास ,  सायास   या   अनायास !  -सतीश  वसंत-पंचमी,  Feb 5, 2022.