संदेश

तो, सावन है!

  अशेष ,  सुंदर   शेष - अवशेष ,   समन   बरस   जायें ,  तो ,  सावन   है !  आत्मा   के   हर्ष   चेतन   विमर्श   करें , जग - आँसुओं   की   गाथा   सुनें , मन   यों   छहर   जाये ,  तो ,  सावन   है !  बादलों   के   बेचैन ,  सरस   दलों   में   माटी   की   हँसी ,  दृष्टि   और   द्वंद्व   बारी - बारी   से   कौंध   जायें , तुम   यों   भीग   जाओ ,  तो ,  सावन   है !  ऊँचे   आसन   का   उज्ज्वल   मान जीवन   के   रोर - शोर   से   परे पोर - पोर   में   धूलि   की   पीर   लिये जब   झूम   सके ,  तो ,  सावन   है !  - सतीश  14 Jul, 2022. 

आलोचना

आलोचना बनती है लोच से, लोचन से- सकारात्मक लोच से,  सकारात्मक, सकर्मक लोचन से।  सरकार हो, या व्यक्ति, आस्था हो या व्यवस्था,  या शासन-प्रशासन ही,  या फिर अपने भीतर का द्वन्द्व,   संघर्ष, पक्ष-विपक्ष,  या कोई बाहरी प्रतिद्वंद्वी -   इनकी “आलोचना”   इसी भाव से यदि आये, तो वह सुलोचना हो जाती है,  श्रेष्ठ, श्रेष्ठता, महती हो जाती है!  ⁃ सतीश  14 July, 2022.

गुरू

संभवत:, सबसे बड़ा गुरू  हमारी चेतना है। वह हमेशा हमें सचेत रखती है, निश्चेत होने से बचाती है; जगह-जगह, आवश्यकतावश, हमें टोकती है; वह “अहम्” को “हम” की ओर  ले जाती है, धर्म को  शील-मर्यादा देकर सच्चे रूपों में धार्मिक बनाती है, विज्ञान को ज्ञान के  सकारात्मक आयामों से जोड़ती है; जीवन-भावों को नयी-नयी संधि, समास देकर  अर्थ-तत्वों से भर देती है, हमारे जीवन को सच्चा उपसर्ग, सार्थक प्रत्यय देती है, देती रहती है।  - सतीश  5 September, 2021.

अनिश्चितता

हर पग जाना-पहचाना हो, पूर्व-निर्मित, निश्चित हो -  ऐसी सोच क्यों?  अनिश्चिताएँ  अनदेखी संभावनाओं से भरी हो सकती हैं! -  संभावनाएँ, जो अनजानी हैं, संभावनाएँ, जो बिलकुल दूरस्थ होती हैं,  संभावनाएँ, जो व्यावहारिक-सी नहीं लगती!  हर दिन हमें थोड़ी-सी अनिश्चितता अपने मन में, कदम में, योजना में,  विचारों में, भावनाओं में, आम दिनचर्या में घोलते रहना चाहिए!  सतीश  30 June, 2022. 

जीवन और कला

जीवन ही है जीवन की सबसे बड़ी कला, जीवन है जीवन की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति, सबसे बड़ी कविता, सबसे बड़ी कहानी।  बड़ी कला और छोटा जीवन क्या अभीष्ट है? ⁃ सतीश  30 June, 2022. 

सच्ची बचपना, सच्चा स्व

बादलों की आदतें, वर्षा की कहावतें  एक दूसरे से मिल जायें, यही है प्रकृति की बचपना  और बचपना की प्रकृति!  सागर के ऊपर इठला लेना, पर्वत से गलबाहियाँ करना, मन-मस्त होकर फिर उससे टकरा जाना,  यही है बचपना!  माना कि वर्षा की बूँदों से तुम भीग गये!  संभवत:, यह कच्ची, आधी- अधूरी अनुभूति हो।  जब मन की खोहों में बसी कुछ परिचित, कुछ अपरिचित, कुछ स्पष्ट, कुछ अटपटी, कुछ सपाट, कुछ उलझी, कुछ सहज, कुछ असहज स्मृतियों से अनायास तुम तरल हुए,  तो सच मानो भीगने की  है वही पूरी समग्रता, पूरी व्याप्ति!  और जीवन की सच्ची बचपना !  सहज रूपों में  पूछ लेता है ऐसा बालपन कि बादल के शरीर में जल-बूँदों का वर्चस्व क्या है?  ठोस का छहर कर पसर जाने के भीतर,  तुम बोलो, सच्चा स्व क्या है?  -सतीश  12 Jul, 2022

लॉस वेगस की एक सुबह

रूखे-सूखे पर्वत के पीछे  धीरे-धीरे उठता हुआ, मग्न सूरज, स्वर्ण-आभा से प्रसन्न क्षितिज, लाल-लाल होती प्रकृति!  कभी मन्द, कभी तेज बहती हवा - हँसती हुई, भोली, और थोड़ी ठंडी!  कभी चुपचाप बह जाती, कभी सशब्द कुछ कहती!  हवा की साँसें  आपस में एक-दूसरे को  उकसातीं, फिर, अविकारपूर्ण गति से अपनी लय में लीन हो जातीं। सीधी-सीधी आ रहीं हैं सूर्य की किरणें, पर, इस वेला में,  अनावश्यक रूप से तीक्ष्ण होने से हिचक रही हैं। अधिकांश शहर अब भी सोया है, रात में व्यस्त, अति व्यस्त रहने वालीं  सड़कें शांतमना, खुली लेटीं हैं; सूरज निरंतर ऊपर उठने की धुन में है, सुबह सुबह होने में लगी है!  सतीश  3 July 2022/4th July 2022.