संदेश

राजनीति से पलायन

 राजनीति से पलायन, एक विशुद्ध ढोंग है, छबीला छल है; हम सबों का, विशेषकर, तथाकथित  पढ़े-लिखे लोगों का एक सजीव पाप है! -  समाज के प्रति, व्यवस्था के प्रति,  देश, देश-कर्म के प्रति,  विश्व और विश्व-बोध के प्रति!  सत्ता के गलियारों में, मुँडेरों, डेरों पर अपराधी, चोर, उचक्के, घोटालेबाज़  यदि उपस्थित हैं, आसीन हैं, तो, इसके लिए हम सभी उत्तरदायी हैं! -  व्यक्ति की भूमिका में, समाज की भूमि पर!  जीवन का कोई क्षेत्र नहीं, कोई अंग नहीं, जिससे होकर राजनीति गुजरती नहीं; फिर, हम इससे ऊपर उठने का छद्म-भाव क्यों पाले रहते हैं? क्यों ओढ़े रहते हैं?  क्यों पलायन को प्रबुद्ध, शुद्ध बताते रहते हैं? अपने आप को विशेष, अशेष जताते रहते हैं?  एक सीमा के बाद, राजनीति से तथाकथित दूरी  हर तर्क, हर बहस को, हर कविता-कहानी-कला को  अघोषित आलाप-विलाप बना देती है, भ्रांत पथ की अंतहीन यात्रा पर भेज देती है!  ⁃ सतीश  22 August, 2022.  1.03 PM.

नव बिहार, नव विहार!

पर्यावरण! जंगल!  जलवायु-परिवर्तन!  वरण की अथक यात्रा?  या हरण का सतेज वरण?  बिहार का उच्च तेजार्थ !  चारा, बेचारा! सामाजिक न्याय की पुनीत गति? सम्पूर्ण क्रांति की पूर्ण कथा-प्रथा!  अनवरत, अप्रतिहत, अरूद्ध !  “सामाजिक न्याय” का सुंदर, स्वस्थ विहार! हार मत कहना इसे, ऐ बिहार, यह किसी के गले का “आरक्षित” हार है! यह प्रजातंत्र की धन्य, मूर्द्धन्य जय है! सुशासन है,  विकास की अदम्य कथा है।  जंगल नहीं यह,  जन, जन-हित के गलित-विगलित, द्रवित होने की, होते रहने  की  नैसर्गिक प्रकृति है!  मौसम की बदल है, भरे सावन में गुर्राते बादलों की  चतुर अदला-बदली का मनोहारी खेल है! अर्थ के अर्थों से सनी-सनी  एक आवश्यक, अबाध्य क्रिया है?  रास-लास की लीला है?  जलवायु-परिवर्तन!  प्रजातंत्र के जल और वायु को  नयी वर्तनी मिल गई है!  क्षितिज और पावक भी किसी पुनीत यज्ञ-भाव से धवल हो उठे हैं!  याद रखनी चाहिए तुम्हें कि लोग कहते हैं,  यह “विकास”, “विकास-पुरूष” की  ऊँची आशाओं के सुंदर, “हसीन” स्वप्नों की...

परम्परा

परम्परा के परों की उड़ानें बड़ी होती हैं! उसके विशद अर्थ और सुंदर बोध नाहक, निरर्थक अवरोध नहीं बनते, बल्कि, सभ्यता-संस्कृति की सार्थक गति, धवल प्रेरणा, युगों की संचित ऊर्जा, भविष्य के ऊँचे, मानक संकेत होते हैं!  आधुनिकता की अति अधीरता,  आतुर आपाधापी में भी परम्परा के समुद्र में पैठते रहना, गहरे गोते लगाते रहना, हेय नहीं, अवांछनीय नहीं, त्याज्य नहीं!  बल्कि, एक सहज जीवन-धर्म है!  समुद्र, आसमान और हवा  परम्परा नहीं हैं?  उनके व्यक्तित्व, उनके चित्त, चरित्र परम्परा के मानक अवयव नहीं हैं?  सही-सच्चे अर्थों में, वे  पुरातन हैं, सनातन हैं, आधुनिक, अत्याधुनिक भी!  ⁃ सतीश  12 August/27 August, 2022.  (Union City/ Pismo Beach, California)

“महादेव” कविता क्यों?

हमें “इज्जत” से कहीं परहेज़ नहीं, पर, “सम्मान” को कैसे भूल जाऊँ?  हमें “किरदार” से कोई हिचक नहीं, फिर, “भूमिका” की भूमि क्यों खो जाये?  हमें , चलो, “जरूरत” की आदत लगी रहे,  पर, “आवश्यकता” को कैसे, कहाँ मिटा दूँ?  संस्कृति के सहर्ष संचय में, उसकी उत्सुक, उदार, उज्ज्वल गति-लीला में, मानवता के श्रवण-गायन और मनन में माना कि “खुदा-अल्लाह” की सात्विक पुकार होती रहे, पर, किसी बोध-अबोध, किसी विचारधारा की अतिशयता से ग्रस्त होकर  “महादेव” की कविता होने, न होने का प्रश्न क्यों?  अस्तित्व-अनस्तित्व के अति व्याकुल तर्क,  बेचैन रोक-टोक क्यों?  चोट से अधिक  चोट की अनुभूति सघन होती है! समय की देह पर, युगों के शरीर पर  भावों की गहरी पपड़ियाँ पड़ी हैं,  उन्हें पहचानने की, छीलने-हटाने की  कोई आवश्यकता नहीं?  — सतीश  5 August, 2022. 

तो, सावन है!

  अशेष ,  सुंदर   शेष - अवशेष ,   समन   बरस   जायें ,  तो ,  सावन   है !  आत्मा   के   हर्ष   चेतन   विमर्श   करें , जग - आँसुओं   की   गाथा   सुनें , मन   यों   छहर   जाये ,  तो ,  सावन   है !  बादलों   के   बेचैन ,  सरस   दलों   में   माटी   की   हँसी ,  दृष्टि   और   द्वंद्व   बारी - बारी   से   कौंध   जायें , तुम   यों   भीग   जाओ ,  तो ,  सावन   है !  ऊँचे   आसन   का   उज्ज्वल   मान जीवन   के   रोर - शोर   से   परे पोर - पोर   में   धूलि   की   पीर   लिये जब   झूम   सके ,  तो ,  सावन   है !  - सतीश  14 Jul, 2022. 

आलोचना

आलोचना बनती है लोच से, लोचन से- सकारात्मक लोच से,  सकारात्मक, सकर्मक लोचन से।  सरकार हो, या व्यक्ति, आस्था हो या व्यवस्था,  या शासन-प्रशासन ही,  या फिर अपने भीतर का द्वन्द्व,   संघर्ष, पक्ष-विपक्ष,  या कोई बाहरी प्रतिद्वंद्वी -   इनकी “आलोचना”   इसी भाव से यदि आये, तो वह सुलोचना हो जाती है,  श्रेष्ठ, श्रेष्ठता, महती हो जाती है!  ⁃ सतीश  14 July, 2022.

गुरू

संभवत:, सबसे बड़ा गुरू  हमारी चेतना है। वह हमेशा हमें सचेत रखती है, निश्चेत होने से बचाती है; जगह-जगह, आवश्यकतावश, हमें टोकती है; वह “अहम्” को “हम” की ओर  ले जाती है, धर्म को  शील-मर्यादा देकर सच्चे रूपों में धार्मिक बनाती है, विज्ञान को ज्ञान के  सकारात्मक आयामों से जोड़ती है; जीवन-भावों को नयी-नयी संधि, समास देकर  अर्थ-तत्वों से भर देती है, हमारे जीवन को सच्चा उपसर्ग, सार्थक प्रत्यय देती है, देती रहती है।  - सतीश  5 September, 2021.