संदेश

मैं तेरी लौ सा जला करूँ

ऐ दीया, अपने मनोदेश की खुली भूमि पर बैठकर, सृजन-बाती पर चढ़-चढ़ कर, पूरे जग में लहक-लहक कर, मैं तेरी लौ-सा जला करूँ!  कठोर कलुष और छलपूर्ण तिमिर की छाती में घुस-घुस कर, मर्यादा-माटी पर टिक-टिक कर भोले भावों की भाषा में मैं तेरी लौ-सा जला करूँ!  नकारों-धिक्कारों-तिरस्कारों की  हवाओं में हिल-डुल कर भी कर्म-धर्म के शील-संवेग, उष्मा-ऊर्जा से लिपट-लिपट कर मैं तेरी लौ-सा जला करूँ!  अपने घर में ही निर्वासित होकर, सदियों का संताप पीकर जब भगवान श्रीराम वापस घर लौटे, तब, अयोध्या के घर-घर में बैठी दीप-कांति! ऐ दीया, ऐ दीप-कांति, मैं तेरी लौ-सा जला करूँ! सतीश  दीपावली, 2020.  (13 Nov)

फूलों से शृंगार करूँ?

फूलों   से   शृंगार   करूँ ?  आतंक   का   मरघट   बसा   है , बड़े   युद्ध   की   वेला   है ; तर्क - वितर्क   की   घूर्णियों   में लिखने   वाले   हैं   बिक   रहे ; जीवन   निरीह   घूर   रहा , मानवता   है   रो   रही।   इधर ,  मैं   प्रेम   के   बंध   सजाऊँ ? प्यारी   साँझ   के   लाल   कपोल , मन   का   अभिसार   देखूँ ? पुतलियों   के   आर - पार तितलियों   के   साथ   उड़ूँ ? फूलों   से   शृंगार   करूँ ?  - सतीश   October 31, 2023. 

लतिका

लतिका   - - - लतिका  !  हर   दिन   हँस - हँस   कर उसने   धूप   पी   ली ; वह   जीवन   से   भर   गई , हरी - भरी   हो   गई।   वह   चहारदीवारी   पर   चढ़   गई , झुरमुटों   पर   सरक   गई , काँटों   पर   तन   गई , फूलों   के   साथ   महक   गई , जीवन   जी   गई !  चुपचाप ,  तन्मय ,  प्रसन्न  !  सतीश   Oct 28, 2023

युद्ध-प्रश्न

  युद्ध के प्रश्न सीधे नहीं होते, वे छोटे या सरल तो कभी नहीं होते।  युद्ध के पहले या बाद या युद्ध-काल में  सचेतन आत्मा रोती ही है; रक्त इधर गिरे, या उधर मानवीय आत्मा छोटी होती ही है।  पर, कई बार युद्ध हम पर थोप दिया जाता है, वह हमारे दरवाज़े पर निष्ठुर, निर्मम खड़ा रहता है, तब उससे मुँह मोड़ पिघलने को बेचैन मोममयी शांति की बत्ती जलाना अकर्मण्य हो जाना है, एक सवाक् पलायन है।  बहुतेरे युद्ध क्या हमें उन्हें चुनने या नहीं चुनने का अवसर देते हैं?  फिर, युद्ध के मैदान में अश्रु-ग्रस्त होना, शांति के सुंदर, मोहक छंदों को पढ़ना, आदर्श से भरी संवेदनाओं से अतिशय पीड़ित होना है कर्म से विमुख होना, समाज और विश्व के कल्याण-भाव को अस्त-व्यस्त करना!  मानवता को पराजित करना!! दुःख कहो या दुर्भाग्य, मनुष्यता की कहानी  बार-बार अटक जाती है प्रश्नों के इस भँवर में,  भिन्न-भिन्न निष्ठा और नियत के साथ एक बेसुध नियति की टेक पर।  -सतीश  Oct 21, 2023 सप्तमी, दुर्गा पूजा 

मानवता क्या है?

सोचता हूँ, मानवता क्या है?  पहले हत्या करना,  फिर, निर्दोषों को अपनी रक्षा का कवच बनाना मानवता है? पहले आतंक मचाना, फिर, बच्चों, महिलाओं की आड़ में छिपना मानवता है?  पहले युद्ध बरपा देना, फिर, चारों ओर, युद्ध-विराम के कलामय आँसू गिराना मानवता है?  पहले फ़साद करना, फिर, “शांति” के सुविधाजनक श्लोक पढ़ना मानवता है?  पहले घृणा से लबालब हरकतें करना, फिर, “प्यार” की कहावतों को ढूँढ लाना, उसे “दुकानों” पर, चाँदनियों पर, चौकों पर,  गीतों में, ग़ज़लों में, वक्तव्यों में, तर्कों में  पूरी योजना के साथ सशरीर खड़ा कर देना मानवता है?  सोचना चाहता हूँ,  ईमानदारी से, सच्ची निष्ठा से,  धर्म की आँखों में समय-काल को रख कर कि मानवता क्या है?  — सतीश  Oct 19, 2023. 

किरणें और पत्थर

 किरणें और पत्थर  - - भोर की भोली-भाली,विनम्र किरणें भी  पत्थरों को जगाना जानती हैं, उनमें उजाला भरना जानती हैं, रूखे-सूखे कलेजे को तप्त करना जानती हैं, शीत-भाव से ठिठुरते उनके मन को बड़ी सहजता से उद्दीप्त करना जानती हैं, ऊँचे,अनमने पाषाणों की जड़ता को तोड़ना जानती हैं!  -सतीश अक्टूबर 19, 2023. 

सत्कार

सत्कार        - - जब - जब   किसी   सत्   को   आकार   देता   हूँ , जब - जब   किसी   सत्य   के   साथ   हो   लेता   हूँ , जब - जब   किसी   सही   को   खुले   भाव   से   बिना   ओट ,  बिना   आग्रह   के   स्वीकार   करता   हूँ , लगता   है ,  सच्चे   अर्थों   में   लेखनी   का ,  मन   का , मानव   और   मानवता   का   सत्कार   करता   हूँ !  - सतीश   April 10, 2023.