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चुप्पी

चुप्पी  अब तक सोचता आया  कि बोलना एक कला है; पर, जीवन के भिन्न-भिन्न पड़ावों पर महसूस करता हूँ कि चुप रहना उससे बड़ी कला है! चुप्पी कभी रूकती है क्या?  कुछ कहती ही रहती है निरंतर वह!  - सतीश  Jan 30, 2023.  & Feb 25, 2023 

बोल निर्झर, बोल

बोल निर्झर, बोल  बोल निर्झर, बोल, तुम क्यों यों बह जाते हो? पर्वत के अन्यमनस्क मन में छाने को, अटपटे ऊँचे शिखर से उतावले होकर  नीचे धरती पर उतरने को,  पत्थरों को भीगाने को, उनके सोये-खोये ह्रदय को झकझोर देने को, राहों में बेफ़िक्री से तने हुए छोटे-बड़े पौधों को कलकल-छलछल भावों  से भर कर ढाढ़स देने को,  सजलता से उत्फुल्ल कर देने को,   घाटियों की धमनियों को छू कर  स्वयं तरल हो जाने को, उनकी मोड़ों की मनभावन करवटों पर फिसल-फिसल कर बढ़ जाने को,  बीहड़ वन की नीरवता को जीवन का रोर-शोर देने को तुम यों छहर जाते हो?  तुम यों फहर जाते हो ?  बोल निर्झर, बोल, तुम क्यों यों बह जाते हो? मूकता भी बोलती है, सच कहूँ ,बहुत बार वो वाचाल होती!  सौंदर्य तेरा मूक या वाचाल है?  बोल निर्झर, बोल, तुम क्यों यों बह जाते हो?  ⁃ सतीश  नबम्बर 16/नबम्बर 26 2024. 

कुछ-कुछ

कुछ-कुछ (मन की उष्मा लिए) “तरल स्मृतियों  के बुलबुले सघन से हो गये हैं, भावनाओं की परिधियाँ पास-पास पड़ी हैं!  फेनिल यादें परत-दर-परत अन्यमनस्क लेटी हैं!  मन की उष्मा लिये चाय सी!” ( तप्त पेय सी) - सतीश मार्च 11, 2024.  कुछ-कुछ (अटकी कलम)  कलम कुछ अटकी-अटकी सी है बेचैन हवा में साँस लेती सी, उँगलियों के बीच   यादों में चुपके ठहरी सी !  वह काग़ज़ पर टिकना भूल गई, मन का ठिकाना ढूँढते-ढूँढते!  कहीं रम कर वह बिसर गई  भावों को कहते-कहते!  - सतीश मार्च 15, 2024

तुम

   तुम  तुम साँझ सी चली गई, तुम भोर सी साकार हुई! घोर अमा में आस्था से उजलती  चाँदनी सी फहर गई, सरल धूप सी तुम पसर गई!  हिचक, कसक, उद्वेग से परे  हवा सी तुम बह गई, -        मन के कोने-कोने में,        जीवन के रग-रग में -        कर्म-धर्म को साथ लिए,        भाव, मर्म, राग-विहाग लिए!  सतीश  मार्च 15, 2024.           

रंग-अंतरंग

  रंग-अंतरंग  लास-उल्लास से भरी हुई  अंतरंग स्मृतियाँ दमक उठीं, अंतस् की छवियाँ लहक गईं तरल पुचकारों, प्यार-फ़व्वारों से; रिक्त भाव भी सहज सिक्त हुए रंग-उमंग के अल्हड़ खिलवाड़ों से- जैसे रूखे-सूखे पर्वत मन से हरे-भरे हुए वर्षा की बूँदों की नादान छुअन से!  -सतीश  मार्च 29, 2024.  रंग पंचमी 

लघु यात्रा, बड़े द्वंद्व

  लघु यात्रा, बड़े द्वंद्व  राजनीति है समाज की आवश्यक आवश्यकता। पर, कई बार वह ऊबा देती है अपने छोटेपन से, अपने ओछेपन से! प्राय:, वह गर्जना में अति व्यस्त रहती है, सर्जना को भूल जाती है!  साहित्य की एक लघु यात्रा मन को क्षरण से बचा लेती है, चरित्र को कुछ औषधि देती है, ह्रदय में बसे खालीपन को विशदता से भर देती है!  पर, कई बार लेखन-क्रिया  निराशा में समाधिस्थ रहती है, रोदन को आत्म-सिद्धि मानती है, कर्म की कठोर भूमि से हटा कर  पलायन की ओर भेज देती है; चिंतन से अधिक चिंता में क़ैद कर देती है, बुद्धि के अराजक प्रलाप-विलाप में  हमें असहाय धकेल देती है!  एक लघु यात्रा के ये बड़े द्वंद्व!  -सतीश  अप्रैल 11, 2024. 

चाहती है कविता

 चाहती है कविता चाहती है कविता कि वह बड़ी हो जाये, जीवन अपने छोटेपन से निकल नहीं पाता! चाहती है कविता कि वो सुंदर हो जाये, गतिविधियाँ, मनोवृत्तियाँ ऊपर उठ नहीं पातीं!  चाहती है कविता कि राजनीति ऊपर चढ़ जाये, भाव-चरित्र “नारेबाज़ी” से आगे बढ़ नहीं पाते!  चाहती है कविता कि वह पुण्य आहुति हो जाये, स्वार्थों की जकड़ थोड़ी भी ढीली हो नहीं पाती!   ⁃ सतीश April 28, 2024.