संदेश

जनवरी, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मेरे भारत

सृष्टि-सृजन का प्रथम नाद,  मानवता की आदि कथा,  सभ्यता-संस्कृति का सुंदरतम बहाव,  धर्म की श्रेष्ठतम ध्वजा, महान्; सत्धर्म-निरत, सत्कर्म-रत, भारती-सुर, वेद-स्वर, मेरे भारत, तुम दीप्त भास्वर, सतेज, सहृदय, शालीन शीर्ष! क्यारी-क्यारी,फाँकों-खाँचों, ख़ेमे-खंडों को पाट-पाट कर,  अपयश-अपमानों को पी-पी कर मेरे भारत, तुमने सदैव उन्नत  मानवता को मन-मान दिया!  जीवन में सीधे पैठ-पैठ कर, वेद-उपनिषदों का अनुसंधान कर, योग-धर्म का संधान कर, निगम-आगम, निवृत्ति-प्रवृत्ति  को साथ समेट, बाँध-बाँध कर,  मेरे भारत, तुमने जीवनमय, अमोल अध्यात्म का गहरे अवगाहन किया!  विविध रीति-रिवाज-रस्मों,  धर्म-मर्म, बोली-भाषा-संवादों,  कृति-प्रकृति, ऋतु-मनुहारों को भूगोल-इतिहास में समेट-सहेज कर, मेरे भारत, तुमने पूरे जग को सनातन सार-तत्व, प्राण-प्रसार दिया!          -सतीश            30 Jan, 2021.

ऐसा हमारा गणतंत्र बने

हमारी व्यवस्था के सब अंग-प्रत्यंग सुचालित-जनसेवी-स्वतंत्र रहें, प्रजातंत्र के यंत्र-तंत्र पर   जन-गण की जय हो, प्रजातंत्र के मूल-मंत्र में देश-हेतु ही चरम ध्येय हो, विद्या-कला-गुण-धन, सब शक्तियाँ देश-मन पर अर्पित हों, ऐसा हमारा गणतंत्र बने। हर शिक्षा से बड़ी देश-शिक्षा हो, हर पूजा से बड़ी देश-पूजा हो, हर कर्म से बड़ा देश-कर्म हो, हर धर्म से बड़ा देश-धर्म हो, हर यज्ञ से बड़ा देश-यज्ञ हो, ऐसा हमारा गणतंत्र बने। तर्क-वितर्क हो, नोंक-झोंक हो, राजनीति के दाँव-पेंच हों, पर, दल-समूह प्रजातंत्र की दलदल न हो, संसद-सभा-संस्थानों की गरिमा बनी रहे, ऐसा हमारा गणतंत्र बने। सत्याग्रहों में सत्य का ईमानदार आग्रह हो, हड़तालों में समस्याओं की सजग पड़ताल हो, प्रदर्शनों में समाधान ढूँढने की सच्ची निष्ठा हो, हमारे अधिकार व कर्तव्य-बोध साथ-साथ बसें, ऐसा हमारा गणतंत्र बने। चाहे पक्ष हो या हो विपक्ष,  विरोध केवल विरोध के लिए न हो; बेहतर से बेहतर होने की  सकारात्मक प्रतिस्पर्धा हो, जन-जन की इकट्ठी प्रगति ही उद्देश्य रहे, ऐसा हमारा गणतंत्र बने।              ...

हर चोट की ओट में

हर   चोट   की   ओट   में   एक   देवी   बैठी   होती   है , सृष्टि   की   शक्तियों   को   सँभालती - सहेजती ; हर   घाव   की   पीड़ा   में सृजन   की   बेचैनी   बोलती   है , हर   दर्द   की   ऐंठन   में कृति - क्रिया   की   सुन्दर   भंगिमाएँ   बसी   होती   हैं। हर   अशुभ   में शुभ ,  शुभ्र   संभावनाएँ   समायी   होती   हैं , हर   ठेस - ठोकर   में ऊँची   छलाँगों   की   ऊर्जा   भरी   होती   है , हर   प्रहार   में प्रेरणाओं   के   चिन्ह   पड़े   होते   हैं , हर   विघ्न   में सुगति - संवेग   के   स्वप्न - संगीत   समाये   होते   हैं , समय   के   कठिन - कठोर   तेवरों   में प्रकृति   के   अदृश्य ,  अमोघ   आशीष   बसे   होते   हैं , हर   तम   म...

मकर-संक्रांति

                मकर - संक्रांति   के   पावन   पर्व   पर सूरज   की   किरणों   को   सीधे - सीधे   मन   में   उतरने   दो , कुहरा - कुहासा - कलुष   छँटने   दो , गहरी ,  बँधी ,  जड़   गाँठों   को ,  धीरे - धीरे   ही   सही ,  खुलने - उघड़ने   दो!  कल   तक   जो   सर्द   था , अब   उसे   नई   पावन   ऊष्मा   से , थोड़ा - थोड़ा   ही   सही , पिघलने - मिटने   दो! तब  जाकर   जीवन   का   एक सार्थक   वसंत   आयेगा  - नये   रंग - उमंग ,  नये   सौंदर्य   के   साथ ,  नई   छवि ,  नई   भाव - भाषा   के   साथ , सुंदर   नियत ,  सुंदर  भव- नियति   के   साथ!  फिर ,  प्रसन्नचित्त   होकर माँ   सरस्वती   वसंत-पंचमी को साथ लिए  जग - जीवन   में विद्या - क...

Big Technology !

                   “They” will define “Diversity”,     They will choose algorithms       To log    Ethics and Civility,       To label Religion and “Ism”,        To prescribe ‘Commune’,       ‘Capital’ and ‘Civilization’,       To create the make and model         Of truth, of goodness, of badness,       Of love and hate,          With their own bits-bytes-bites,          With their own ‘Graphic Design’,          With their own web,          With Liberty, For Liberty!          Technology, Embedded Technology!                                           ...

सत्ता का आग्रह

                               अक्सर ,  हमारी   व्यवस्था   में , सत्ता   के   घोषित   उजले - धवल   घरों   में स्वार्थ - अहम् - प्रपंच   के   ग्रह - तारे   बसे   हैं , पद - पैसे - पहुँच   के अनियंत्रित   तृष्णा - तेवर स्वत्व - साधना   के   पैने   अस्त्र - शस्त्र   बने   हैं; मर्यादा   के   भंजन - मंत्र शक्ति - संचय   के   मेरुदंड   बनकर   तने   हैं , संकुचित   स्व   की   संज्ञाएँ   उपलब्धियों   के बेडौल   आयाम ,  आकृति ,  आयतन   गढ़ती   हैं !  सत्ता   का   ऐसा   अतिशय   आग्रह , वस्तुतः   है   भयकारी   दुराग्रह ; वह   नेतृत्व - नायकों   की   है भम्रित ,  कलुषित ,  हेय   प्रज्ञा  !  आसमान   चिल्ला - चिल्ला   कर अपनी   उच्चता   का  ...

तब मैं किसान हूँ

                                               जब मैं सरकार की नीतियों की ‘सकारात्मक’ आलोचना करता हूँ, तब मैं किसान हूँ! जब मैं केवल विरोध के लिए  विरोध नहीं करता, तब मैं किसान हूँ ! जब मैं देश की सैनिक कारवाई के लिए सेना से प्रमाण नहीं माँगता, तब मैं किसान हूँ! जब मैं लोगों को भरमाने के लिए  झूठ बोल-बोल कर, कोर्ट में माफ़ी माँगने की  हरकतें नहीं करता, तब मैं किसान हूँ! जब मैं लोकसभा-राज्यसभा में  असम्मानीय व्यवहार कर, ‘राजघाट’ पर अनशन करने का  ढोंग नहीं करता, तब मैं किसान हूँ! जब मैं शाहिनबाग के प्रदर्शन-दर्शन को देश के विरूद्ध साज़िश के लिए  इस्तेमाल नहीं करता, तब मैं किसान हूँ! जब मैं प्रजातंत्र की मान्यताओं की बलि नहीं चढ़ाता, तब मैं किसान हूँ! जब मैं देश के मानचित्र, उसकी चौहद्दी  के सम्मान के लिए ‘सत् श्री अकाल’ बोलता हूँ, तब मैं किसान हूँ! जब मैं देश की एकता-अखंडता के लिए  क़ुरान की आयतें पढ़ता हूँ, तब मैं किसान हूँ! जब मै...

लोग कहते हैं

        चाँद के शरीर पर जो जीवन-चिन्ह है, कुछ लोग कहते हैं-  वह दाग है। सूरज में जो जीवन-प्राण-उष्मा-ऊर्जा है, लोग कहते हैं- वह आग है। अपने विधान-पथ में भरी दोपहरी में, जब सूर्य कर्म-सन्नद्ध  होकर  उज्ज्वलता बिखेरता है, लोग कहते हैं, वह तपतपा-तिलमिला-चिलमिला रहा है, वह अनावश्यक रूप से कठोर है। रात जब दुनिया को ऊर्जापूर्ण विश्राम दे रही होती है, लोग कहते हैं, वह आभारहित होकर काली हो गई है, वह अकारण भयकारी हो गई है। यों, लोग कहते हैं, लोग कहते रहते हैं ।                                         - सतीश                                         28-Dec-2020                                                            ...

मुझे तुम्हारी यादों का

                                         मुझे तुम्हारी यादों का हर रूप सुहाना लगता है, जीवन के रंगों-रेशों का हर रूख रूहाना लगता है; गहरे राग-विरागों का यह मूल पुराना लगता है, जीवन के सुंदर सर्गों का यह मुख-मुहाना लगता है । मन यहाँ मिले, तन वहाँ मिले, कुछ ऐसा-ऐसा लगता है, मन यहाँ रमे, तन वहाँ रमे, कुछ यहाँ मिले, कुछ वहाँ मिले, कुछ ऐसा-ऐसा लगता है, मुझे तुम्हारी यादों का  हर रूप सुहाना लगता है। आँखों-ओठों का यह विस्मय कुछ सपना-सपना लगता है, कुंचित केशों का यह संचय कुछ अपना-अपना लगता है । विंध्य से चलती वातों-अलकों से हिमपति का उन्नत शीश मिले, मेघों की साँसों में बहके-बहते, हम साथ उठे गिरे, हम साथ गिरे, पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण सब साथ मिले, सब साथ जुले, कुछ ऐसा-ऐसा लगता है, मुझे तुम्हारी यादों का  हर रूप सुहाना लगता है। सब मूलों में, सब फुनगी में, सब डालों में, सब शाख़ों में, सब शालों में, सब छालों में, सब पत्तों में, सब फूलों में, सब द्रुमों में, सब दामों में,  कलियों क...

बौद्धिक भ्रष्टाचार

                  आये दिन, पत्रों-लेखों-प्रलेखों में विचारों-वादों की क़वायदें, तर्कों-तथ्यों की होड़-तोड़-मरोड़, दर्शन-शास्त्र-विशेषज्ञता की आपाधापी, पूरे वेग-संवेग से, पूरी घूर्णन-शक्ति से क्रियाशील रहती हैं ।  परिवर्तन के छद्म श्लोक पढ़े जातें हैं, प्रज्ञा-प्रवचन के चतुर पैंतरे पेश होते रहते हैं, यों, व्यवस्था के बौद्धिक नायकों-पंचों के प्रवीण प्रपंच जारी रहते हैं । गोष्ठियों-सम्मेलनों-मंडलियों-आंदोलनों में विचारों-विवरणों-वर्णनों-व्योरों के सजे-धजे गुंफ-गुच्छ  सामने आते रहते हैं । बुद्धि के समर्थ खिलाड़ी-व्यापारी ग़रीबों-मज़दूरों-किसानों के नारे लगा-लगा कर, जन-कल्याण के पवित्र कुंड में नहा-नहा कर, स्वार्थ-फसल की तंदुरुस्त क़ीमत  वसूलते रहते हैं ।  स्वत्व के संकीर्ण अर्थों में समाकर, जीवन-मूल्यों से भटक कर, शिक्षा-शील की चादर ओढ़-ओढ़ कर, बौद्धिकता का यह निर्मम खेल हमारे समय-युग का  सबसे शातिर भ्रष्टाचार है - अपने आकार-प्रकार-आयाम-असर में । रोज-रोज के जीवन में, आम तौर पर, बौद्धिक-वर्ग इस भ्रष्टाचार का सक्रिय पोषक है...

जोड़ की शक्ति

            जीवन में, जीवन-संबंधों में, अक्सर, जोड़ की शक्तियाँ  और ‘घटाव’ की प्रवृत्तियाँ साथ-साथ रहती हैं- अपनी-अपनी अस्मिता, अपनी-अपनी भूमिका के साथ । ‘जोड़’ को बढ़ाते रहो, ‘घटाव’ को हटाते रहो, यही संबंधों को निभाने का, उसे दूर तक खींच लाने का, सकारात्मक भावनाओं के मानचित्र गढ़ने का, जीवन को शालीन उच्चता तक उठाने का, सबसे सहज, सबसे सरल पथ है, पथ-मंत्र भी ।                                                       - सतीश                                                        18- दिसंबर - 2020

कविता को, जीवन को

                    चाहता हूँ, कोशिश करूँ, करता रहूँ कि कविता को जीवन, जीवन की समग्रता दे दूँ, कला नहीं, पूरा-पूरा जीवन दे दूँ । शिल्प-शैली-साँचें में फँसे बिना, विचारों-वादों के ख़ेमे-खाँचे में जड़े बिना, कविता को जीवन की सुबह-शाम, दिन-रात, श्रम-स्वेद-वेद, संघर्ष-सौंदर्य दे दूँ, ती़क्ष्ण गर्मी, भीषण वर्षा, शरद्-शीत, हेमंत-वसंत दे दूँ, पीड़ा-हर्ष, तप-ताप, राम-श्याम-कर्म-धर्म, मान-मूल्य-मर्यादा-मर्म दे दूँ। और, जीवन को सीधे-सीधे कविता दे दूँ -  कम-अधिक, स्याह-धवल, शेष-अशेष कविता दे दूँ।     - -                  सतीश,                           18 दिसंबर, 2020. 

ऐसा ही क्यों

                           ग्रंथों-पुस्तकों को ही नहीं, जीवन को पढ़ते हुए, जीवन को सीधे-सीधे जीते हुए, बाहर-भीतर के सूत्रों को बाँधते हुए, समझना चाहता हूँ कि   पर्वत की छाती क्यों फूली है? नदियों को बहने की आदत क्यों लगी है? विशाल समुद्र भी तट पर बेचैन क्यों हो जाता है? फूलों को खिलने-मुस्काने की  प्रवृत्ति कैसी मिली है? काँटों को चुभने की लत क्यों लगी है? आसमान को नीला-नीला रहने की ज़िद्द क्यों पड़ी है? धरती को अच्छा-बुरा, ठोस-तरल,  आग-राग - सबों को धरे-समेटे रहने की मनोवृत्ति क्यों मिली है? यों, इन तत्वों-तारों को हिगराते-सुलझाते हुए, अपने आप को खोजते-खँगालते-माँजते रहने की कोशिश में पूछता रहता हूँ - ऐसा ही क्यों?                                       - - सतीश                                          21 -...

सबसे बड़ी सत्ता

समय के व्यापक संदर्भों में, संभव है, जो सत्ता में नहीं है, वह सबसे बड़ी सत्ता है, या सबसे बड़ी सत्ता बन जाये - - वैसे ही जैसे, आकाश उन्मुक्त होकर ऊँचा हो जाता है, धरती ह्रदय से फैल कर विशद हो जाती है, हवा खुले मन से बह कर चारों ओर पसर जाती है, जन-मन तक पहुँच जाती है । यों, एक गाँधी  जन-आंदोलन बन जाता है, यों, एक जयप्रकाश  सत्ता की भ्रष्ट शाही तानों के विरूद्ध  खड़ा हो जाता है, यों, एक मार्टिन लूथर किंग, व्यवस्था के विकृत रंगों-भेदों के विरूद्ध  एक महान स्वप्न-स्वर हो जाता है -  सबसे बड़ी सत्ता बनकर।                                                                      - सतीश                                 SuJu Coffee, Fremont, California                     ...