चिराग़
चिराग़ - इस दीपावली की रात एक चिराग़ को देखकर लगा - चिराग़ में, चिराग़ की आग में , उसकी तपन में, जलन में एक राग है, रागत्व है। फिर, मन पूछने लगा - यह राग, यह रागत्व क्या है? उधर, चिराग़ भय और भयानकता को भेदते हुए, निराशा, नकारों- नकारात्मकताओं को निगलते हुए, कलुष-क्लेश के कुलिश व्यक्तित्व से जूझते हुए, अग-जग के दुस्सह दुराचार से सुलगते हुए, दुर्दम्य दुराशा के दुरावरण पर दमकते हुए रात की अँधेरी प्रवृत्तियों के सीने पर लहकता गया! पूरी निष्ठा से, चिराग़ जीता रहा, जलता रहा, जागता रहा! चिराग़ की मन-प्रवृत्ति एक कर्म-यज्ञ में लगी रही, उसका ज्वलन एक कर्म-यज्ञ का हवन बन गया ! उसे रात भर अनवरत, अप्रतिहत जलते-सुलगते-लहकते देख कर विभोर सृष्टि-प्रकृति ने चिराग़ की ज्वाला की लालिमा को लेकर भोर के कपोल में भोली-भाली ललाई भर दी! तब लगा कि जो चिराग़ की कर्म-चेतना की आग की लय है, वही पूँजीभूत, व्यापक रूप में भोर के मुखमंडल पर पवित्र, सकर्मक महाग्नि का महावलय है! और, यों, चिराग़ की कर्माभ-लालिमा मेहनत से खिंची आसमान की न...