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चिराग़

  चिराग़   -  इस दीपावली की रात  एक चिराग़ को देखकर लगा - चिराग़ में, चिराग़ की आग में , उसकी तपन में, जलन में  एक राग है, रागत्व है।  फिर, मन पूछने लगा - यह राग, यह रागत्व क्या है? उधर, चिराग़ भय और भयानकता को भेदते हुए, निराशा, नकारों- नकारात्मकताओं को निगलते हुए, कलुष-क्लेश के कुलिश व्यक्तित्व से जूझते हुए, अग-जग के दुस्सह दुराचार से सुलगते हुए, दुर्दम्य दुराशा के दुरावरण पर दमकते हुए रात की अँधेरी प्रवृत्तियों के सीने पर लहकता गया! पूरी निष्ठा से, चिराग़ जीता रहा, जलता रहा, जागता रहा! चिराग़ की मन-प्रवृत्ति एक कर्म-यज्ञ में लगी रही, उसका ज्वलन एक कर्म-यज्ञ का हवन बन गया !  उसे रात भर अनवरत, अप्रतिहत  जलते-सुलगते-लहकते देख कर  विभोर सृष्टि-प्रकृति ने चिराग़ की ज्वाला की लालिमा को लेकर  भोर के कपोल में भोली-भाली ललाई भर दी! तब लगा कि जो चिराग़ की कर्म-चेतना की आग की लय है, वही पूँजीभूत, व्यापक रूप में  भोर के मुखमंडल पर पवित्र, सकर्मक  महाग्नि का महावलय है!  और, यों, चिराग़ की कर्माभ-लालिमा मेहनत से खिंची आसमान की न...

दीप-दीप की ज्योति में

दीप-दीप की ज्योति में - -  हे ईश्वर, तेरे चरणों पर  एक प्रार्थना अर्पित है कि  दीप-दीप की ज्योति में हम सब  हर पल अन्तर्ज्योति की यात्रा करें, मन की आँखें खोल-खोल कर अन्तर्मन का विस्तार करें; “अहम्” को “हम” की ओर ले जाकर  जीवन में समग्र जीवन का संधान करें; सभ्यता-संस्कृति की उज्ज्वल राममय राहों पर  मानव बनने की क्रिया-प्रक्रिया को, उसके मान-मानकों को  हर दिन जल-उजल कर, पूरी समर्थता से लहक-लहक कर  सह्रदय नव प्रयास दें!  ⁃ सतीश  दीपावली, 2024.

दिल्ली

दिल्ली  धर्म के तेज-तर्रार, सजीले, फुर्तीले,  समय-समय पर नुकीले नारों के निर्घोषों, रेतीले वादों, छवीले दावों के बीच सात्विक यमुना प्रदूषित होती गई!  राजनीति के दाँव-पेंच, उसकी ओट-चोट, फिसलन भरे समीकरणों के बीच  हवा ही शुद्ध नहीं रही!  साँसें अपने आप से डरने लगीं, उनका पूरा व्यक्तित्व ज़हरीला होता गया!  यही दिल्ली है, यही दिल्ली का जीवन, यही जीवन की दिल्ली!  -सतीश  गुरुग्राम, 27  जून, 2024

एक इठलाता आलिंगन

 एक इठलाता आलिंगन आँखों से आँखों की प्रेमिल टकराहट, पुतलियों पर हर्षित लास-विलास,  अधरों पर चौड़ी हँसी की चहल-पहल, माँसल अनुभूतियों में डूबे लोल कपोल,  भावों के स्पंदनों से कानों के डोलते कुंडल!  एक-दूसरे की पीठों पर उत्साह की सहज थपथपाहट, तन और मन के मधुर मिलन के संयुक्त झोंकों पर एक इठलाता आलिंगन!  सतीश  30 जून, 2024. 

वो मन, वो तन

वो मन, वो तन  वो मन से हरी-हरी, वो तन से भरी-भरी, भंगिमाओं में तीक्ष्ण-तप्त !  आँखों में मर्म की मोड़ लिए पुलकित पुतली की प्रेम-छाँह में मुस्कानों की कोमल डोरों पर हर मन को बाँध रही हो  हर साँस को साध रही हो!  कानों की सुंदर पीली बाली  हिलडुल कर, झूम-झमक कर हल्के झन-झन से है भरती  मन की गहरी, प्रसन्न प्याली !  धीरे-धीरे बहती धीर हवा  भाव-भव के कोने-कोने को  कोमल, शीतल, सरल करती, तरुणाई के अंग-अंग को अरुणाई देती !  आसमान के पूर्वी, दायें सिरे से झाँकती  चाँदनी है रागिनी सौंपती धरती, दुर्ग, क़िला, टीला, उच्च शीर्ष को !  अलसाई घाटियों को समवेत उमेठती,  हिचकती कन्दराओं की तंद्रा मिटाती !  - सतीश 

क़िला के खंडहर का प्रश्न

क़िला के खंडहर का प्रश्न  क़िला के भीतर तलवारों की प्रदर्शनी थी, उसकी भित्तियों पर  शृंगार की तीक्ष्ण कला-अभिव्यक्ति भी थी!  वहाँ खंडहर ने पूछ ही लिया कि  तलवार शृंगार के लिए होते हैं?  या शृंगार तलवार के लिए होते हैं?  वे परस्पर पूरक होते हैं?  एक-दूसरे को धार देते हैं?  या, मिलजुल कर अपने आप को समाप्त करते हैं?  -सतीश  अक्टूबर 13, 2024 जोधपुर, राजस्थान 

बेटी, तुम !

बेटी, तुम !  जो कभी बीत न सके, तुम जीवन की वह शील-कथा बनो!  जो कभी रीत न सके, तुम जीवन की वह दिव्य प्रथा बनो!  कोई सीमा-रेखा, कोई चौहद्दी जिसे समेट न सके, तुम जीवन का वह अपरिमित मानचित्र बनो!  युगों से युगांतर तक जो चलती रही, बढ़ती रहे, तुम जीवन की वह अनंत रीति बनो, कल्प से कल्पांतर तक जो मनभावन बनी रहे,  तुम जीवन की वह प्यारी लोरी बनो!  लक्ष्यों, मंज़िलों, मील-स्तम्भों से परे  तुम जीवन की एक पवित्र यात्रा बनो, तुम उस यात्रा का परम पथिक, चरम साधिका बनो!  जब-जब काली घटाएँ घिरे, तुम उनको मर्यादा के गुलाल की गहरी लाली दे देना, उनके चरित्र को अपने मन का सुंदर संस्कार दे देना, अपने व्यक्तित्व की भव्य छवि, पुनीत परिष्कार दे देना!  ऐ बाल-भोर!  हर क्षितिज से उठकर जीवन की पत्ती-पत्ती में, पोर-पोर में, कोर-कोर में, विंदु-विंदु, वर्ण-वर्ण में, उजालों की हर आस में, हर विन्यास में बस जाने वाली, रम जाने वाली, लीन-तल्लीन, लय हो जाने वाली  धवल किरणों की उज्ज्वल  शक्ति-संस्कृति, शालीन समृद्धि बनो!  सतीश  अक्टूबर 12, 2014 विजयादशमी...

वो नदी, वो हवा

वो नदी, वो हवा  वो नदी चुपचाप बह रही है, अपनी यादों में तरल होती हुई।  शरीर पर बन आई हैं,  सीधी-टेढ़ी सप्राण लकीरें,  स्मृतियों के घुमावों से गुजर कर।   दूर बसी भावनाओं से होकर आती मन से कुछ हल्की, ठिठोली करती हवा नदी की नसों में कुछ स्पंदन भरती,  हिलोरें बनाती, यहाँ-वहाँ पुलक की घूर्णियाँ रचती, नीले-नीले जल को बारी-बारी से  स्नेहिल संकुचन, सिहरन और प्रसार देती; फिर, बिना कुछ कहे स्वयं बह जाती !  इधर, नदी अपने अनुद्विग्न  किनारों से  खेलती चुपचाप बह रही है, बहती ही जा रही है!  ⁃ सतीश  अक्टूबर 8, 2024.   

भुट्टे वाली की हँसी

भुट्टे वाली की हँसी  शाम का समय था,  मझौले क़द के हरे-भरे पर्वत के पीछे  सूरज छिप जाने पर तुला था; पिछले जून,  झारखंड में देवघर से राँची जाने की राह में कई लेनों वाली तेज-तर्रार सड़क पर  “गोला” के एक व्यस्त टॉल-बुथ के थोड़ा पहले  हाशिये पर, पथ के हाशिये पर एक महिला  (साँवला रंग, फुर्तीली आँखें, तीखी नाक,सुघड़ चेहरे को लिए) अपनी आशाओं की मही को थामे भुट्टा बना रही थी,  बेच रही थी, एक भोली, स्पष्ट, निर्मल, निमग्न  हँसी के साथ ! साथ में थी पढ़ाई के समय के बाद  स्कूल से लौटी बेटी,  एक छोटा सा बेटा भी था-  जो स्कूल जाने की अवस्था में नहीं था,  पर, जीवन को सीधे पढ़ने में तल्लीन था; दोनों अपनी माँ को मदद् कर रहे थे उछल-कूद कर,  एक-दूसरे के उत्साह को उल्लास देकर -  कुंठा की गाँठ से मुक्त,  निर्विकार, उद्वेग-रहित!  सामने भुट्टे स्निग्ध आग में पक रहे थे।  वो महिला धर्म को कोस नहीं रही थी, व्यवस्था की ओर उँगली नहीं उठाये थी, पूँजी के तरीक़ों को,  पूँजीपतियों के आचार-विचारों को आह नहीं दे रही थी; वह हँस र...

स्वप्न

स्वप्न  - - स्वप्न कि सभ्यता के आँसुओं को पोंछ दूँ, संस्कृति के मन को गुन लूँ।  स्वप्न कि  धरती की धूल से लिपट लूँ, आकाश की सोच को थाम लूँ । स्वप्न कि हर संघर्ष में सुलग लूँ, हर प्राप्ति में शालीन रहूँ ।  स्वप्न कि  किरणों की प्रवृत्तियों को पढ़ लूँ,  अंधेरों की व्याप्ति को परख लूँ । स्वप्न कि समय के रव को समझ लूँ, शून्य की चुप्पी को बोध लूँ । स्वप्न कि मानवता की आह, कचोट से जुड़ सकूँ, जीवन-यज्ञ की सु-अग्नि में उजल सकूँ। स्वप्न !  सतत् ! अनवरत !  ⁃ सतीश  अक्टूबर 6, 2024 (सिंगापुर के रास्ते में)