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चाँद, तुम अकेले !

चाँद,  तेरे अन्तर्मन में न जाने कितने-कितने दीप जले हैं! काले-से-काले बादल भी तुझको छू लेने को आकुल हैं, सच पूछो, तो, वे तुझको बहुविध ढँक लेने को आतुर हैं!  तुम अकेले, वे असंख्य !  विधि का यही लेखा-जोखा ! देखो, चारों ओर मन-तन से टूटे-टूटे मेघ-खंड भी किसी भाँति युक्त-संयुक्त होने की भंगिमा लिए  पूरे आसमान में मदिर भाव से मँडलाते हैं!  पर, तुम रहे सदा एकचित्त, एकाग्र, सभी रवों के बीच नीरवता को साधे!  चाँदनी को धमनियों में बसाये अँधेरों की अस्मिता को अशब्द ललकारते हुए!  रात के बीचों-बीच  तम के साकार विकारों से जूझते  तुम अकेले, वे असंख्य!  विधि का यही लेखा-जोखा!  -सतीश  Sep 30, 2023. 

असफलता

 “ असफलता ”  - - संभव   है , “ असफलता ”  में   सफलताओं    की   सुंदर   लताएँ सवाक्   बसी   हों ,  सचेतन   फैली   हों ,  सह्रदय   पसरी   हों , - मनभावन   फलों   की   संभावनाओं   से   हरी - भरी !       -  सतीश सितम्बर  26, 2023

मन-मुक्त, भाव-सिक्त

आज सुबह-सुबह की प्यारी धूप यों ही फिसल गई, तरल होकर फैल गई, हवाओं में है आनंदित सरसराहट, लताएँ सीधे-सहज मन से परस्पर उलझ कर  अपने आप को भूल गईं! फूलों की पंखुड़ियाँ अलसा कर  एक-दूसरे पर लेटी हैं,  विविध रंगों के मकरंद हैं उमंग में थिरकते,  दूर-दूर तक सुवास सहज ही भेज देते, परिचित-अपरिचित भावनाओं के संग!  हाँ, स्मृतियों में बैठी रही तुम निश्चिंत भाव से - कभी सिमटती, स्वयं को सहेजती, कभी खुल कर अनायास बह जाती आसक्त रक्त में,  मन-मुक्त, भाव-सिक्त !  -सतीश  Sep 18, 2023 

मन पूछ ही लेता है

न जाने क्यों मन पूछ ही लेता है, सूरज को भी दीये की,  इतने दीयों की आवश्यकता क्यों हो जाती है?  अन्यमनस्क हो, या आत्म-मुग्ध हो फूलों का बरसना, बरसाना समय को याद रह जायेगा, इतिहास के ह्रदय में वह काँटों से अधिक चुभेगा!  ये फूल जब यहाँ-वहाँ यों बरसा दिये  जाते हैं, उनके सौंदर्य कुछ खो से जाते हैं, वे मन को सहज लुभाते नहीं, भाते नहीं! वे मर्म नहीं जगाते, कोई कर्म-धर्म नहीं जगाते!  सूरज अँधेरे से होड़ में क्यों है?  फूल को शूल बनने की आवश्यकता क्या है?  मन पूछ ही लेता है!    - सतीश  Sept 16, 2023 

जीवन-यात्रा

जीवन - यात्रा       -  जीवन   की   अनगढ़   यात्रा   में फूलों   से   हमने   बातें   की , काँटों   में   हमने   राहें   गढ़ी   । सोते - जगते ,  चलते - फिरते ,  उठते - गिरते   सूरज - चाँद - सितारों   से हमने   जीवन   की   लोरी   सुनी  !  अनवरत   जताती   आईं   वे   लोरियाँ   कि साफ़ - सुथरी   नियत   की   उंगुली   पकड़ टोहती   रहे   हर   साँस ,  हर   आस जीवन - यात्रा   के   छोटे - बड़े   लक्ष्यों   को ; टोकती   रहे   हमें   हमेशा   वह   कि   हर   पग   पर   ऊँचे   मूल्यों   का   सत्कार   हो , हर   मग   पर   सत्कर्मों - सत्धर्मों   का   साथ   हो !  सोते - जगते ,  चलते - फिरते ,  उठते - गिरते   सूरज - चाँद - सितारों   से हमने   जीवन   की   ...

जीवन को क्या चाहिए?

जीवन   को   क्या   चाहिए ? जीवन   को   क्या   चाहिए ? वन   की   बीहड़ता , या   उपवन   की   साज - सज्जा ?  एक   अल्हड़ ,  अनगढ़   विस्तार   या   उपवन   के   तौर - तरीक़ों   में   बँधी   पत्तियाँ , सँवरे   फूल ,  सुघड़   व्यक्तित्व   के   आत्म - मुग्ध   विटप  ?  अनजानी ,  अनमनी ,  मन - मस्त   राहें   या   परिचित   मनोदशा   के   मान्य   पथ  ?  सचमुच ,  जीवन   को   क्या   चाहिए ?  - सतीश   May10, 2023. 

स्वप्न के मन-द्वार

स्वप्न   के   मन - द्वार    भले   ही ,  राहें   रूक   जाती   हैं   किसी   ओट   में , आँखें   थम   जाती   हैं   कहीं   सहम   कर ,  साँसें   उद्विग्न   हो   जाती   हैं   यहाँ - वहाँ , पर ,  स्वप्नों   के   मन - द्वार   खुले   के   खुले   हैं ! वे   बताते   रहते   हैं  - आसमान   के   रास्ते   आसान   नहीं   होते , कई   बार ,  वे   कबूतरों   के   नहीं ,  गरूड़   के   होते   हैं !  हाँ ,  कुछ   स्वप्न   अनवरत   पूछते   रहते   हैं  - किस   यज्ञ   का   हवन   बनूँ   मैं ?  किन   वादों ,  यादों   का   ध्यान   धरूँ ?  किन   समुद्रों   का   मन्थन   करूँ ? किन   मर्यादाओं   को   नमन   करूँ ?  किस   शक्ति   ...

खिड़की

खिड़की सुबह - सुबह , खिड़की   से   होकर   आसमान   का   छोटा   टुकड़ा   दिखा , जीवन   के   रण   को   आसों   की   किरणें   मिलीं , धूप   की   भोली ,  मार्मिक   उष्णता   में स्वप्नों   को   उन्मत्त   उड़ानों   की   यादें   आयीं !  पूरे   आसमान   को   मापने - भाँपने   के   लिए   मोह   छोड़   कर   घर   से   बाहर   निकलना   पड़ा  - जीवन   की   अनिश्चितताओं   को   टोहते   हुए , जीवन   की   नियति   को   पढ़ते   हुए , नियति   के   जीवन   को   ढूँढते   हुए !  घर   की   खिड़कियाँ   स्मृति   में   गहरी   जड़ी   रहीं !  - सतीश   Feb 9, 2023 

मन-शरीर, नौका पर

मन - शरीर, नौका पर मन   का   शरीर   जीवन - नौका   के   एक   कोने   में   बैठकर सूनेपन   को   ताक   रहा   था ,  परख   रहा   था !  वर्षों - वर्ष   आँखों   से   होकर   गुजर   गये ,  स्मृतियाँ   हवा   की   तरह   बह   गयीं , कहीं   बस   छूती   हुईं ,  कहीं   हिलोरें   जगातीं , कहीं   सहमी ,  कहीं   स्वर - सुर   में   खोयीं !  मन   में   सूनेपन   का   विस्तार   था , सूनेपन   में   मन   की   विह्वलता   थी। चुप्पी   ही   सन्नाटे   की   बोली   थी , समय   की   काया   में   बसी   हमजोली   थी , कहीं   रूखी - सूखी ,  कहीं   भीगी - गीली   थी।   उधर ,  चारों   ओर ,  जीवन - सरिता   का   जल द्विधा   में   अटका   पड़ा अपनी   गति   भूल ...

ग्रीष्म

ग्रीष्म   - वसंत   अभी - अभी   गया , वर्षा   आयेगी   ही ! पर , इस   बीच ,  उजलने   की   प्रक्रिया   में , दमकने   की   प्रतिज्ञा   लिए , तप - निष्ठा   को   साथ   लेकर   भी ग्रीष्म   इतना   आकुल ,  उद्विग्न   क्यों   हो   गया ?  इतना   शुष्क ,  इतना   तप्त   क्यों   हो   गया ?  अपने   तन - तेवर   में   कराल   क्यों   हो   गया ?  ⁃  सतीश   May 22, 2023. 

पत्थरों का भीग जाना

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पत्थरों   का   भीग   जाना   ऊपर   नील - नील   आसमान   हो और   नीचे   नीला ,  स्वच्छ ,  पवित्र   जल , तो ,  पत्थरों   को   भी   भीग   जाना   अच्छा   लगता   है   । ऊँचे ,  अनमने   पहाड़ों   को   भी बर्फ़   की   पतली - पतली   परत   ओढ़ कुछ   नरम ,  नम   हो   जाना सुहाना   लगता   है ! सतीश